गाजर घास के साथ मेरे दो दशक (भाग-1)

                          - पंकज अवधिया 

एक राष्ट्रीय विज्ञान सम्मेलन मे भाग लेने मै बस से जबलपुर से मंडला जा रहा था। यह 1998 की बात है। सडक के दोनो ओर गाजर घास फैली हुयी थी। जब बस घाटी मे पहुँची तो जंगलो के अन्दर भी मुझे इसका फैलाव दिखा। मैने एक सहयात्री से पूछा क्या आप इसे पहचानते है? उन्होने तपाक से कहा, हाँ यह राम फूल है? गाजर घास जैसे हानिकारक़ खरपतवार के लिये इतना अच्छा नाम सुनकर मुझे क्रोध आया और अचरज भी हुआ। फिर जब उन्होने इस नाम के पीछे छिपे कारण को बताया तो सब समझ मे आ गया। यह उसी तरह हर जगह फैली हुयी है जिस तरह भगवान राम। बस इस एक वाक्य ने इसके फैलाव से जुडे सत्य को बता दिया।

 छात्र जीवन मे दसवी कक्षा मे बच्चो के लिये आयोजित विज्ञान सम्मेलन मे तात्कालिक भाषण प्रतियोगिता ले लिये मै धमतरी गया। प्रतियोगियो को चिट निकालनी पडती थी फिर चिट पर लिखे विषय पर भाषण देना होता था। मुझे गाजर घास पर बोलने के लिये कहा गया। उस समय किताबी ज्ञान था थोडा बहुत इसलिये ज्यादा अच्छे से नही बोल पाया। बाद मे मैने इस पौधे के विषय मे विस्तार से जानकारी एकत्र की। जब कृषि विज्ञान की शिक्षा लेनी शुरु की तो फिर इस खरपतवार से मेरा चोली-दामन का साथ हो गया। खरपतवार विज्ञान विषय मे नाना प्रकार के खरपतवारो के विषय मे बताया जाता था पर मेरा ध्यान इसी पर केन्द्रित रहा। आज गाजर घास से परिचय हुये दो दशक से अधिक बीत गये। मैने सैकडो लेख लिखे, व्याख्यान दिये और पर्चे बाँटे पर जब मै पीछे मुडकर देखता हूँ तो मुझे लगता है कि जैसे मैने कुछ भी नही किया। इन दो दशको मे गाजर घास दिन दोगुनी रात चौगुनी की गति से बढती गयी और मै अकेला कुछ भी नही कर पाया। इससे अपना नाम जोडकर कितने लोग आम से विशिष्ट बन गये, कनिष्ठ से वरिष्ठ बन गये पर गाजर घास का बाल भी बाँका नही हुआ। दुनिया भर के गाजर घास विशेषज्ञ दो बार मिल कर योजनाए बना चुके और अब तीसरी बार मिलने की कोशिश कर रहे है पर इसका निर्बाध फैलाव जारी है। हमारा देश इससे विशेषतौर पर प्रभावित है। आयातित गेहूँ के साथ इसने क्या प्रवेश किया इसे भारत भा गया। आज देश के सभी कोनो मे यह खरपतवार कहर ढा रहा है। आम लोग अब इससे लडना छोड साथ रहने की आदत बना रहे है। इससे होने वाली एलर्जी के लिये इसे नष्ट करने की बजाय दवाओ का सहारा ले रहे है। गाजर घास का मुद्दा अब मीडिया के लिये पुराना हो चुका है। उसे इसमे किसी तरह की सनंसनी नजर नही आती है। यही कारण है कि महिनो तक देश भर मे कही इसके विषय मे नही छपता। पिछले दो दशको से इसे लगातार देखने और जानने की कोशिश मे मै ही इसकी एलर्जी का शिकार हो गया। चिकित्सको की सख्त हिदायत है कि मै इससे दूर रहूँ। पर इसके समूल नाश का बीडा जो मैने उठाया है वह दूर बैठ कर तो पूरा होने से रहा। इस लेखमाला मे मै इस खरपतवार के साथ बिताये दो दशको के दौरान जो अनुभव हुये, उनके विषय मे लिखूंगा।

 (लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

 © सर्वाधिकार सुरक्षित          

गाजर घास को कांग्रेस घास क्यो कहा जाता है?

गाजर घास के साथ मेरे दो दशक (भाग-2)

                    - पंकज अवधिया

 इन दो दशको मे कई सरकारे बदल गयी। गाजर घास पर व्याख्यान देने मै देश के अलग-अलग हिस्सो मे गया। लोग अक्सर पूछा करते थे कि इसे काँग्रेस वीड क्यो कहा जाता है? इस नाम को मेरे व्याख्यान के दौरान सुनकर कांग्रेस के राजनीतिक विरोधियो के चेहरे पर मुस्कान आ जाती थी। वे कई बार इसे गाजर घास न कहकर कांग्रेसीयो की घास कहते थे। मै बडी अजीब स्थिति मे होता था। अब गाजर घास तो किसी पार्टी से ताल्लुक नही रखती है ठीक मच्छरो की तरह। उससे तो देश की सभी पार्टियो के नेता और कार्यकर्ता प्रभावित होते है। कोई भेदभाव नही होता। मैने गाजर घास पर केन्द्रित अपने अंतरराष्ट्रीय ग्रुप मे जब दुनिया भर के विशेषज्ञो के सामने यह प्रश्न रखा तो बडे ही विचित्र उत्तर आये। किसी ने कहा कि यह अमेरिका से पीएल 480 योजना के तहत आयात किये गये गये गेहूँ के साथ भारत आयी और उस समय चूँकि कांग्रेस की सरकार थी इसलिये इसे कांग्रेस ग्रास का नाम मिला। कुछ ने कहा कि यह उसी तरह देश मे फैली जिस तरह एक समय कांग्रेस पार्टी फैली। ब्रिटेन के वैज्ञानिक हैरी इवांस ने तो लिख दिया कि संसद भवन परिसर मे काँग्रेस की इमारत गाजर घास की तरह है इसलिये इसका नाम कांग्रेस घास पडा (Parthenium is called Congress Weed in India because it is having a similar structure like the Congress building in Parliament Annexe, New Delhi.). मुझे तो इनमे से कोई तर्क नही जँचता। बहुत से वैज्ञानिक यह तर्क देते है कि समूह मे उगने के कारण इसे यह नाम मिला। यह तर्क अधिक ठोस लगता है।  

बहुत कम लोग यह जानते है कि गाजर घास को एक साहित्यिक नाम भी मिला हुआ है। किसने यह नाम दिया इसका पता मुझे अभी तक नही चला है। यह नाम है चटक चाँदनी। इसके सफेद फूलो को देखकर हो सकता है किसी कवि ह्र्दय ने यह नाम सुझाया हो। यह नाम वैज्ञानिक दस्तावेजो तक ही सीमित है। इसका एक अंग्रेजी नाम व्हाइट टाप भी है। हो सकता है चटक चाँदनी इसका अनुवाद हो। यदि यह सच है तो फिर इसमे कोई दो राय नही कि अनुवादित नाम मूल नाम से ज्यादा सुन्दर है।

 गाजर के समान पत्ती होने के कारण इसे गाजर घास कहा जाता है अन्यथा गाजर से इसका और कोई वास्ता नही है। पर इस गाजर के कारण कभी=कभी रोचक वाक्ये हो जाते है। इन्दौर से निकलने वाली एक पत्रिका ने गाजर घास पर मेरा आलेख प्रकाशित किया। पर गाजर घास के चित्र की जगह गाजर का चित्र डाल दिया। मैने सम्पादक महोदय को फोन किया तो पता चला कि साज-सज्जा वाले केवल शीर्षक देखकर ही चित्र डाल देते है। चूँकि उसने गाजर सुना था इसलिये इसी का चित्र डाल दिया। उसे काफी डाँट पडी। पर इसका असर उल्टा हुआ। कुछ महिनो बाद पत्रिका मे गाजर के हलवे पर किसी का लेख छपा। इस बार चित्र तो नही डाला गया पर गाजर के आगे गाजर घास का हलवा लिख दिया। अर्थ का अनर्थ हो गया।

 गाजर घास उन्मूलन का जमीनी अभियान  

शिक्षा के दौरान बहुत पढा था कि गाजर घास से एलर्जी होती है पर कभी किसी गाजर घास जनित एलर्जी के शिकार को देखा नही था। रायपुर मे एक अभियान के दौरान मैने एक रिहायशी कालोनी के निवासियो को व्याख्यान दिया और फिर मुँह, नाक, कान बाँध कर हम लोग जुट गये गाजर घास को उखाडने मे। हाथ मे कुछ ने दास्ताने पहने थे तो कुछ ने पालीथीन की झिल्लीयो को ही दास्ताने बना लिये थे। अचानक शोर हुआ। सब लोग एक बुजुर्ग व्यक्ति को घेर कर खडे हो गये। पता चला उन्हे गाजर घास से एलर्जी के कारण साँस फूल रही थी और पूरे शरीर मे चकत्ते निकल रहे थे। आनन-फानन मे डाक्टर को बुलाया गया। डाक्टर ने आते ही उन्हे डाँटा और कहा कि जब आपको पता है इससे एलर्जी है तो फिर आप यह क्यो करते है? बाद मे पता चला कि बहुत पहले से इन सज्जन को गाजर घास से एलर्जी थी और इसके लिये उन्होने चिकित्सा भी करवायी थी। पर गाजर घास को उखाडने का उनमे जुनून था। इसीलिये मेरे व्याख्यान के बाद घर वालो से नजर बचाकर वे सक्रिय हो गये। उस अभियान के बाद मैने निश्चय किया कि केवल स्वस्थ्य लोगो को ही ऐसे अभियान मे शामिल किया जाये और सम्भव हो तो एक डाक्टर भी साथ हो।

 पर यह निर्णय आसान नही था। स्वस्थ लोगो की पहचान कैसे की जाये? मेरे अभियान बिना किसी आर्थिक सहायता से होते थे और जेब से ही दास्ताने वगैरह जुगाडने पडते थे। गाजर घास से एलर्जी है या नही- यह पता लगाना आसान नही है। डाक्टर इसमे समय लेते है। कई तरह के परीक्षण किये जाते है। पैसे भी लगते है। फिर यह भी जरुरी नही कि स्वस्थ्य व्यक्ति हमेशा इस एलर्जी से बचे रहे। इसके लिये समय-समय पर जाँच करवानी चाहिये। उस समय अभियान जोरो पर था। दिन मे औसतन दस स्थानो मे व्याख्यान होते थे और फिर सब मिलकर इसे उखाडते थे। अब इतने सारे लोगो का परीक्षण हो तो हो कैसे? मैने व्याख्यानो मे यह बात उठायी। बहुत से सुझाव आये कि आम लोगो से चन्दा लिया जाये। आखिर यह अभियान उन्ही के लिये था। पर पैसे माँगना मुझे जँचा नही। पैसे की माँग बहुत से लोगो को इस जागरुकता अभियान से दूर कर सकती थी। फिर पैसा झगडे की जड भी तो है। कई स्थानो पर विशेषकर अमीरो की कालोनियो मे निवासी व्याख्यान से प्रभावित तो होते थे पर गाजर घास उखाडने की मेहनत से बचते थे। वे अपने मजदूरो और नौकरो को अभियान मे भेज देते थे। भले ही उनका स्वास्थ्य अमीरो के लिये मायने न रखे पर मुझे उनकी चिंता रहती थी। एक बार सम्पन्न इस एलर्जी का इलाज करवा सकते है पर बेचारा गरीब एक बार फँसा तो जिन्दगी भर पैसे खर्चता रहेगा।

 कई बार मुझ पर भी सन्देह किया जाता था। गाजर घास के नाम से संस्था है और फिर यह विश्व स्तर का वैज्ञानिक है। इसे इस अभियान के लिये पैसे मिलते होंगे। भला मुफ्त मे कोई क्यो अपना समय और पैसा बर्बाद करेगा? उनकी सोच भी गलत नही थी। आजकल सच मे ऐसी ही मानसिकता हो गयी है। कुछ मुझ पर आरोप लगाते थे कि आप पैसे खर्च करे और सारी व्यवस्था देखे। पर सौभाग्य से ऐसे बहुत कम लोग ही मिले। ज्यादातर लोगो ने इस अभियान को हाथो हाथ लिया। स्थानीय अखबार इसे प्रमुखता से छापते रहे और लोग अभियान के लिये सम्पर्क करते रहे। शहर के आस-पास मै अपने स्कूटर से चला जाता था और दूरी के लिये बस का सहारा था।

 कुछ समय तक अभियान चलाने के बाद यह लगने लगा कि प्रतीकात्मक रुप से गाजर घास उखाड कर दिखाना जरुरी है पर हजारो हेक्टेयर जमीन मे फैली गाजर घास को इस विधि से तो नही समाप्त किया जा सकता। यह तो रावण के सिर की तरह लगने लगी। जितना काटो उतना फैलने लगती। अभियान के कुछ सप्ताह बाद ही फिर उसका राज हो जाता। फिर अभियान तो अभियान है। सबसे कस कर मेहनत नही करवायी जा सकती। श्रमदान अपनी इच्छा से होता है। किसी ने जड सहित उखाडी तो किसी ने अधूरा छोड फोटोग्राफर की ओर रुख करना पसन्द किया। हाँ इस अभियान से लोग यह अवश्य जान जाते थे कि गाजर घास क्या है और इससे क्या नुकसान है? बहुत से सक्षम लोग अपने घरो के आस-पास से इसे उखाडवाकर अपने कर्तव्यो की इतिश्री मान लेते थे। अब समस्या यह हुयी कि बेकार जमीन मे उग रही गाजर घास को कौन उखाडे?

 

इस लेखमाला का अगला विषय

 

 

 

बेकार जमीन की गाजर घास : समस्या की जड

 

 

बेकार जमीन मे उग रही गाजर घास चिंता का मुख्य विषय है। यह आबादी सीड बैक का काम करती है। आप तो जानते ही है कि इसका एक पौधा हजारो बीज पैदा करता है और ज्यादातर बीजो मे नये पौधे को जन्म देने की क्षमता होती है। बेकार जमीन मे साल दर साल बीज तैयार होकर आस-पास के क्षेत्रो मे बिखरते रहते है। ये बीज जमीन के अन्दर भी पडे रहते है। रिहायशी इलाको मे ये बीज कई माध्यमो से पहुँचते है। इन बेकार जमीन से आने वाले वाहन बहुत से बीज अपने साथ ले आते है। वैज्ञानिक अनुसन्धान के अनुसार रेले इन बीजो के प्रसार मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अनजाने मे ही सही पर इससे बीज दूर-दूर तक फैलते रहते है। मै अपने लेखो मे श्रीलंका का उदाहरण देता हूँ जहाँ शांति सेना के आगमन से पहले गाजर घास नही थी। वहाँ के वैज्ञानिक बताते है कि शांति सेना के वाहनो के साथ भारत से गाजर घास के बीज अंजाने मे श्रीलंका पहुँचे और कुछ ही वर्षो मे ये पूरे श्रीलंका मे फैल गये। आस्ट्रेलियाई वैज्ञानिको ने सुझाया है कि गाजर घास प्रभावित क्षेत्रो से आने वाली हर गाडी को अच्छे से धोया जाये ताकि बीजो का प्रसार न हो पर यह जमीनी स्तर पर सम्भव नही जान पडता है।

 

आम तौर पर उन भागो मे जहाँ औद्योगिक इकाईयाँ होती है इस खरपतवार का प्रकोप देखा जाता है। इसके पीछे भी यही कारण है। वाहनो की सतत आवाजाही से बीज फैलते जाते है। भिलाई मे गाजर घास का जबरदस्त फैलाव इसका सशक्त उदाहरण है। बस्तर के लोहाण्डीगुडा मे गाजर घास की संख्या नही के बराबर थी। अब वहाँ स्टील प्लाँट लगने वाला है। अचानक ही वाहनो की आवाजाही बढ गयी है। परिणामस्वरुप अब गाजर घास वहाँ पैर पसारने लगी है। उडीसा के नियमगिरि मे भी यही दिख रहा है। जैव-विविधता से पूर्ण इस पर्वत पर गाजर घास नही थी पर जब से बाक्साइट खनन के नाम पर मनुष्य़ॉ की गतिविधियाँ बढी है तब से आस-पास के शहरो से ट्रको के माध्यम से गाजर घास के बीज पर्वत पर आ रहे है और तेजी से फैल रहे है। थोडे ही समय मे स्थिति विकराल हो जायेगी। जिस तरह गाजर घास देश के दूसरे इलाको मे जैव-विविधता और देशी वनस्पतियो के लिये सिरदर्द बनी हुयी है उसी तरह अब नियमगिरि मे भी अब इसका ताँडव होने वाला है।

 

रिहायशी कालोनियो मे लोग अपने घर मे वाटिका तैयार करते है। उसके लिये मिट्टी की आवश्यकत्ता होती है। यह मिट्टी कहाँ से आती है? उन्ही बेकार जमीनो से जहाँ गाजर घास उगती है। मिट्टी के साथ गाजर घास के असंख्य बीज आ जाते है। इस तरह कालोनियो मे हर साल बीज पहुँचते रहते है और शहर के अन्दर फैलते रहते है। अब एक-एक को पकडकर कैसे समझाया जाये? कुछ मान भी जाये तो उनका प्रश्न होता है कि आखिर मिट्टी कहाँ से लाये? दूरस्थ गाँवो से जहाँ गाजर घास नही है। यह उत्तर उन्हे संतुष्ट नही कर पाता है। यही भी नंगा सच है कि दूरस्थ गाँव भी अब इससे नही बचे है। फिर आम लोग मिट्टी न लाये तो सार्वजनिक उद्यानो मे मिट्टी आती रहती है। बडे पैमाने पर। इससे भी गाजर घास का प्रवेश शहर के अन्दर होता रहता है। गाजर घास के फैलाव को रोकने के लिये व्यापक पैमाने पर कार्य योजना बनाने की जरुरत है। यह तभी सम्भव है जब इसकी गम्भीरता को समझा जाये। आम जनता सरकारो पर दबाव बनाये। यह भी कडवा सच है कि इस तरह की कार्य योजनाओ को अच्छी नजरो से नही देखा जाता। आम लोग सोचते है कि वैज्ञानिक और योजनाकार किसी भी माध्यम से पैसा डकारने की फिराक मे है और इसलिये इतनी बडी योजना बना रहे है। आज भ्रष्टाचार देश के रोम-रोम मे व्याप्त है। गंगा की सफाई जैसी बडी योजनाओ पर करोडो खर्च होने के बाद भी नतीज सिफर ही रहा है। आम लोगो का गाजर घास की कार्ययोजना को भी इसी नजरिये से देखना गलत नही है।   

 

मै अपने व्याख्यानो मे गाजर घास की तुलना सीमा पार के आतंकवादियो से करता हूँ और कहता हूँ कि आप देश के अन्दर इन्हे जितना भी मार लीजिये कुछ नही होगा। जब तक सीमा पार के ट्रेनिग कैम्प नष्ट नही किये जायेगे तब तह कहर जारी रहेगा। सीमा पार के कैम्प गाजर घास के नजरिये से बेकार जमीन मे उग रही गाजर घास है। श्रोता बडी आसानी से इस उदाहरण से सारी बात समझ जाते है।

 

विदेशी कीट जाइगोग्रामा पर नजर

वनस्पतियो विशेषकर खरपतवारो को खाने वाले कीटो मे मेरी सदा से रुचि रही है। मैने ब्लूमिया नामक खरपतवार पर क्राइसोलिना नामक कीट को न केवल खोजा बल्कि लम्बे समय तक इस पर काम भी किया। पर कीटो से खरपतवार नियंत्रण पर मै संश्य की स्थिति मे रहा। दुनिया भर के सन्दर्भ साहित्य बताते है कि कैसे कीटो को विशेष खरपतवारो के लिये छोडा गया और शीघ्र ही उन्होने अपना रंग दिखाया और दूसरी वनस्पतियो को खाने लगे। ये मित्र से शत्रु बन गये। कीटो से खरपतवार नियंत्रण हमेशा ही से खतरो भरा रहा है। गाजर घास के नियंत्रण के लिये जाइगोग्रामा नामक कीट का उपयोग होता है। हमारे देश मे इस पर गहन अनुसन्धान हुये है। शुरु मे यह हल्ला हुआ कि गाजर घास के लिये छोडा गया जाइगोग्रामा सूर्यमुखी को नुकसान पहुँचा रहा है। एक जाँच समिति बनायी गयी जिसने फैसला दिया कि ऐसा कुछ नही है। उसके बाद इस कीट को प्रकृति मे गाजर घास के नियंत्रण के लिये छोडे जाने की अनुमति मिल गयी। हमारे वैज्ञानिको ने इसे बहुत सी वनस्पतियो पर आजमाया और बताया कि ये किसी भी परिस्थिति मे गाजर घास के अलावा कुछ नही खाते। आज देश भर मे इन कीटो को देखा जा सकता है। गाजर घास की तरह ही यह कीट भी विदेशी है।

 

कुछ वर्षो पहले मैने अपने ग्रुप के माध्यम से यह प्रश्न किया कि कितनी वनस्पतियो पर इस कीट को परखा जा चुका है? तो जवाब मिला सैकडो पर हमारे देश मे तो हजारो वनस्पतियाँ है। ज्यादातर वनस्पतियाँ वनो मे है और दिव्य औषधीय गुणो से भरपूर है। क्या इन सभी पर इस कीट के परीक्षण किये गये है? वैज्ञानिक बगले झाँकने लगे और बोले सब पर परीक्षण कहाँ सम्भव है? आर्थिक महत्व की फसलो और कुछ पेडो पर इसका परीक्षण हुआ है। फिर इसी आधार पर इस छोड दिया गया है। मै इस आधे-अधूरे परीक्षण के पक्ष मे नही हूँ। कालांतर मे कही ये अभिशाप न बन जाये इसकी मुझे अधिक चिंता है। आज कृषि वैज्ञानिक फसलो पर अनुसन्धान तक सीमित है। जबकि ये कीट जंगलो मे भी फैले है। इनकी संख्या मे लगातार वृद्धि हो रही है। क्या कभी किसी ने यह जानने की कोशिश की है कि देशी चिडिया जब इस कीट को खाती है तो इस नयी कीट से उस पर और अंतोगत्वा उसकी आबादी पर क्या असर पडता है? प्रकृति मे बहुत से उपयोगी कीट भी है। कही ये विदेशी कीट इन कीटो पर नकारात्मक प्रभाव तो नही डाल रहे है? कौन हर जगह इन पर नजर रखे हुये है? आदि-आदि बहुत से प्रश्न है जो सिर उठाये खडे है। इनका जवाब किसी के पास नही है। जैसे ही इस कीट ने कुछ गलत किया अचानक ही हंगामा खडा हो जायेगा। मेरे बहुत से वैज्ञानिक मित्र इन प्रश्नो को सुनकर कह देते है कि यह पूरी तरह से सेफ है पर वे बिना किसी वैज्ञानिक प्रमाण के ये बात कहते है। अब चूँकि वे वैज्ञानिक है इसलिये बिना परीक्षण ही राय देने लगे और हम मानने भी लगे-ये कैसे हो सकता है? हमारे देश मे मुठ्ठी भर लोग ही इन विषयो पर निर्णय लेते है। इन निर्णयो मे आम लोगो की राय नही ली जाती है। समस्या आती भी है तो फिर ये मुठ्ठी भर लोग ही उसे सुलझा लेते है। अपने किसी को फँसने नही देते है। यही कारण है कि मेरे द्वारा उठाये गये प्रश्न अभी तक अनुत्तरित है और मेरी आवाज नक्कारखाने मे तूती की आवाज साबित हो रही है।

 

अंतरराष्ट्रीय एलिलोपैथी सम्मेलन मे भाग लेने मै धारवाड गया तो इन कीटो के प्रति अपना मोह नही छोड पाया। कुछ कीट एकत्र कर लिये और उन्हे लेकर वापस रायपुर लौट गया। रास्ते मे ट्रेन मे सहयात्रियो के लिये ये कौतूहल का विषय रहा। मुझे इस बहाने उन्हे गाजर घास के बारे मे बताने का मौका मिल गया। रायपुर आकर मैने अपनी प्रयोग शाला मे इन कीटो को रखा और कई प्रकार के परीक्षण किये। नयी वनस्पतियो को खिलाया फिर पूर्ण सूर्य ग्रहण के दौरान कीटो पर इसका असर देखने के लिये मैने जिन कीटो को चुना उनमे जाइगोग्रामा भी था। उन दिनो मै अपने प्लास्टिक खाने वाले कीट पर शोध कर रहा था। इन्हे भी इस कीट के साथ रखा। मै इन्हे प्रकृति मे छोडने से बचता रहा।

जाइगोग्रामा और आम लोग

 

जैसे-जैसे जाइगोग्रामा ने देश मे फैलना शुरु किया देश भर से गाजर घास को खाने वाले नये कीट की खोज के दावे सामने आने लगे। मुझे ढेरो पत्र मिले जिनमे यह दावा किया गया था कि उन्होने गाजर घास को खाने वाले कीडे को खोज निकाला है और इसके लिये उन्हे इनाम मिलना चाहिये। जब उन्हे बताया जाता कि इसे वैज्ञानिको ने ही छोडा है तो वे दुखी हो जाते। इस क़ीट को छोडने के कुछ समय बाद ही यह बात स्पष्ट हो गयी कि अकेले इसके बूते पर गाजर घास का समूल नाश सम्भव नही है। जबलपुर जहाँ इस कीट पर सबसे अधिक अनुसन्धान हुआ है, मे गाजर घास का फैलाव बदस्तूर जारी रहा। वहाँ असंख्य कीट छोडे जा चुके है। यही स्थिति कमोबेश पूरे देश की है। यह कीट पूरे वर्ष सक्रिय नही रहते पर गाजर घास साल भर न केवल सक्रिय रहती है बल्कि बीजोत्पादन भी करती रहती है। देश की अलग-अलग वातावरणीय परिस्थितियो ने भी इसके जीवन-चक्र पर प्रभाव डाला है। प्रयोगशाला मे जिस तेजी से ये गाजर घास को खाते दिखते है प्रकृति मे ऐसा नही होता है। इस कीट को बाँटने का कार्य अब भी जोर-शोर से जारी है। बहुत से अनुसन्धान संस्थान कीट मुहैया करवा रहे है और देश भर अभियान चलाकर इन्हे छोडा जा रहा है।

 

आस्ट्रेलिया मे कई उपयोगी कीटो की पहचान की गयी पर भारत मे जाइगोग्रामा का प्रयोग ही हो रहा है। यह बडे आश्चर्य का विषय है कि गाजर घास को खाने वाले देशी कीट की अभी तक खोज नही हो पायी है। देशी कीट देश की वातावरणीय परिस्थितियो मे विदेशी कीटो से अधिक दक्षता से काम कर सकते है।

 

 

मैने अभियान के दौरान बहुत बार जाइगोग्रामा के विषय मे चर्चा की। कीटो से वैसे ही आम लोग दूर भागते है। उनके मन मे संश्य रहता है और वे तरह-तरह के सवाल पूछते है। एक बार भिलाई मे एक अभियान के बाद कुछ कीट छोडे गये। दूसरे दिन आस-पडोस के लोग शिकायत लेकर आ गये कि इस कीट ने काट लिया है। प्रभावित लोगो को देखा तो पता चला कि दूसरे कीट ने काटा था। काफी समझाने बुझाने के बाद वे शांत हुये।  

 

गाजर घास का रासायनिक नियंत्रण : समाधान या एक नयी समस्या?

 

गाजर घास के रासायनिक नियंत्रण पर दुनिया भर मे बहुत शोध हुये है। यही कारण है कि आज हमारे वैज्ञानिको के पास रसायनो की लम्बी सूची है। इनमे से ज्यादातर रसायन प्रभावी ढंग से गाजर घास के पौधो को नष्ट कर देते है। अलग-अलग फसलो के लिये अलग-अलग रसायन उपलब्ध है। गाजर घास के साथ यदि दूसरे खरपतवारो को नष्ट करना है तो विशेष रसायन है। आज भी नये रसायनो का विकास हो रहा है और बडी संख्या मे विशेषज्ञ नवीन अनुसन्धान मे लगे है। मै कभी भी रसायनो का समर्थक नही रहा। जैसा मैने पहले लिखा है गाजर घास हजारो हैक्टेयर जमीन मे फैली है। इतने बडे क्षेत्र मे रसायनो का उपयोग मतलब एक नयी मुसीबत को आमंत्रण। एक समस्या को हटाने दूसरी समस्या को विकल्प के रुप मे सामने लाना भला कहाँ की समझदारी है? वैसे भी रसायनिक खेती के दुष्परिणाम हम देख ही रहे है। न अन्न सात्विक रहा और न ही जल की शुद्धता बरकरार रह पा रही है। ऐसे मे गाजर घास के लिये बडी मात्रा मे धरती के सीने पर रसायनो का अम्बार सही नही जान पडता है। यही कारण है कि मै अपने अभियानो मे रसायनो के पक्ष मे कम बोलता हूँ। रसायन पर्यावरण के लिये अभिशाप होने के अलावा महंगे भी है। बडे किसान इनका प्रयोग कर लेते है पर छोटे किसान इसमे सफल न्ही हो पाते है। फिर बेकार जमीन मे गाजर घास को नष्ट करने मे आने वाला व्यय भला कौन उठायेगा?

 

अनुसन्धानकर्ताओ के बीच गाजर घास के रासायनिक नियंत्रण के पक्षधर लोगो का एक गुट है। इसमे काफी रसूखदार लोग है। यही कारण है कि गाजर घास के रासायनिक नियंत्रण पर शोध को ही अधिक प्रोत्साहन दिया जा रहा है। इस प्रोत्साहन के पीछे वे रसायन बनाने वाली कम्पनियाँ भी है जिन्हे गाजर घास से जबरदस्त मुनाफा होता है। वे ऐसे शोधो को प्रायोजित करती है। समय-समय पर आयोजित होने वाले सम्मेलनो मे भी इन कम्पनियो की सक्रियता देखी जा सकती है। कभी-कभी लगता है कि हमारे विशेषज्ञ निज स्वार्थ त्याग कर कम्पनियो की बजाय किसानो को सम्मेलनो मे सक्रिय कर पाते तो इस देश का भला हो जाता है सही मायने मे।

 

देश मे बहुत से ऐसे विशेषज्ञ भी है जो कि अन्य प्रकृति मित्र उपायो की सहायता से गाजर घास का प्रबन्धन करना चाहते है पर सम्मेलनो मे उनकी आवाज रसायनो के पक्षधरो द्वारा दबा दी जाती है। हाल ही मे एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन मे जब मैने गाजर घास की सम्भावित उपयोगिता पर अपने विचार रखे तो एक जाने-माने रसायन समर्थक वैज्ञानिक मुझे सीधी चुनौती देते हुये बोले कि गाजर घास के उपयोग सुझाकर आप लोगो के मन से इसका डर खत्म नही करे। सभी लोगो को डराये। वे आम लोगो मे भय उत्पन्न करना चाहते थे ताकि भयादोहन कर रसायन बेचे जा सके। उस समय तो अन्य वैज्ञानिको ने उन्हे चुप करा दिया पर बाहर निकल कर वे लगातार मुझ पर दबाव बनाते रहे।

 

कुछ वर्षो पहले मुझे नागपुर बुलाया गया। एक कंपनी का दावा था कि उसने गाजर घास के नियंत्रण के लिये एक नया रसायन ईजाद किया है। वे रसायन का परिचय देने को तैयार नही थे। उन्होने क्षेत्रीय अनुसन्धान संस्थान की रपट दिखायी जिसमे उनके उत्पाद की अनुशंसा की गयी थी। उन लोगो ने मेरे सामने गाजर घास पर इस नये रसायन को डाला। कुछ समय मे इसका असर दिखने लगा। अपने अनुभव के आधार पर मैने कहा कि इसमे कुछ भी नया नही है। यह तो पैराक्वाट नामक रसायन है। उन्होने कहा नही इसमे वनस्पतियाँ है। मैने डब्बे को सूंघा तो मेरा शक और बढ गया। बाद मे उनमे से एक असंतुष्ट ने बताया कि बाजार मे मिलने वाले रसायन मे नीम मिलाकर इसे हर्बल का नाम दे दिया गया है। उसने यह भी दावा किया कि विदर्भ मे इसे किसानो के बीच बेचा जा रहा है बहुत अधिक कीमत पर। बाद मे छत्तीसगढ मे भी मैने इसके विषय मे सुना। पता चला कि सम्बन्धित अधिकारियो की झोली भरकर वे बेधडक इसे बेच रहे है। किसान और आम लोग इसका छिडकाव कर रहे है और सस्ते मे उपलब्ध रसायन हर्बल के नाम पर ऊँचे दामो पर बिक रहा है। गाजर घास पर आयोजित द्वीतीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन मे मैने इन्हे आस्ट्रेलियाई वैज्ञानिको के आस-पास मंडराते देखा इस आस मे कि शायद उस देश मे सप्लाई का बडा आर्डर मिल जाये। पर जल्दी ही उन्हे समझ आ गया कि भारत ही तरह आस्ट्रेलिया मे उनकी दाल नही गलने वाली।

 

स्कूली बच्चो से लेकर छोटी-मोटी कम्पनियाँ लगातार विभिन्न संचार माध्यमो से ये दावा करती रहती है कि उन्होने गाजर घास को नष्ट करने का रसायन विकसित किया है। वे इनाम और सम्मान की प्रतीक्षा मे रहते है। पर यह डगर इतनी आसान नही है। मुझे अपने प्राध्यापक की कही बात याद आती है कि किसी भी पौधे पर एसिड डाल देने से वह मर जाता है पर इसका मतलब यह नही है कि किसानो को एसिड डालने की राय दे दी जाये। यह देखना निहायत जरुरी है कि यह कितना प्रभावी है, इसमे कितनी लागत आयेगी, क्या यह धरती के लिये सुरक्षित होगा? आदि-आदि। आम तौर पर मै ऐसे दावे करने वालो को सबसे पहले धन्यवाद देता हूँ कि कम से कम उन्होने गाजर घास की समस्या के लिये कुछ पहल तो की। फिर उन्हे राय देता हूँ कि वे राष्ट्रीय खरपतवार अनुसन्धान संस्थान जबलपुर से सम्पर्क करे और नियमानुसार अपने उत्पाद का परीक्षण कराये। आम तौर पर अविष्कारक को यह डर रहता है कि कही ऐसे संस्थानो से उनके उत्पाद की चोरी न हो जाये। आम जनता के बीच ऐसी बहुत सी बाते फैली होती है और ज्यादातर पूर्व मे घटित हुयी घटनाओ के आधार पर ही कही जाती है। इसके लिये इन संस्थानो ने कई पारदर्शी नियम बनाये है जिनसे निश्चिंत होकर उत्पादो का परीक्षण करवाया जा सकता है। यदि उत्पाद कारगर है तो वे अपनी रपट देंगे जिसके आधार पर आप उसे बाजार मे प्रस्तुत कर सकते है। यहाँ यह भी बताना जरुरी है कि कई बार शिकायत आती है कि रपट मे छेडछाड की जाती है। निज अविष्कारक की जगह बडी कम्पनियो को अधिक महत्व दिया जाता है। यह भी कहा जाता है कि इस परीक्षण के पैसे लगेंगे और हर अविष्कारक के लिये यह सम्भव नही हो पाता है। ऐसे जटिलताए उन्हे निरुत्साहित कर देती है और उनके उत्पाद अखबारो तक ही सीमित हो