गाजर घास के साथ मेरे दो दशक (भाग-1)

                          - पंकज अवधिया 

एक राष्ट्रीय विज्ञान सम्मेलन मे भाग लेने मै बस से जबलपुर से मंडला जा रहा था। यह 1998 की बात है। सडक के दोनो ओर गाजर घास फैली हुयी थी। जब बस घाटी मे पहुँची तो जंगलो के अन्दर भी मुझे इसका फैलाव दिखा। मैने एक सहयात्री से पूछा क्या आप इसे पहचानते है? उन्होने तपाक से कहा, हाँ यह राम फूल है? गाजर घास जैसे हानिकारक़ खरपतवार के लिये इतना अच्छा नाम सुनकर मुझे क्रोध आया और अचरज भी हुआ। फिर जब उन्होने इस नाम के पीछे छिपे कारण को बताया तो सब समझ मे आ गया। यह उसी तरह हर जगह फैली हुयी है जिस तरह भगवान राम। बस इस एक वाक्य ने इसके फैलाव से जुडे सत्य को बता दिया।

 छात्र जीवन मे दसवी कक्षा मे बच्चो के लिये आयोजित विज्ञान सम्मेलन मे तात्कालिक भाषण प्रतियोगिता ले लिये मै धमतरी गया। प्रतियोगियो को चिट निकालनी पडती थी फिर चिट पर लिखे विषय पर भाषण देना होता था। मुझे गाजर घास पर बोलने के लिये कहा गया। उस समय किताबी ज्ञान था थोडा बहुत इसलिये ज्यादा अच्छे से नही बोल पाया। बाद मे मैने इस पौधे के विषय मे विस्तार से जानकारी एकत्र की। जब कृषि विज्ञान की शिक्षा लेनी शुरु की तो फिर इस खरपतवार से मेरा चोली-दामन का साथ हो गया। खरपतवार विज्ञान विषय मे नाना प्रकार के खरपतवारो के विषय मे बताया जाता था पर मेरा ध्यान इसी पर केन्द्रित रहा। आज गाजर घास से परिचय हुये दो दशक से अधिक बीत गये। मैने सैकडो लेख लिखे, व्याख्यान दिये और पर्चे बाँटे पर जब मै पीछे मुडकर देखता हूँ तो मुझे लगता है कि जैसे मैने कुछ भी नही किया। इन दो दशको मे गाजर घास दिन दोगुनी रात चौगुनी की गति से बढती गयी और मै अकेला कुछ भी नही कर पाया। इससे अपना नाम जोडकर कितने लोग आम से विशिष्ट बन गये, कनिष्ठ से वरिष्ठ बन गये पर गाजर घास का बाल भी बाँका नही हुआ। दुनिया भर के गाजर घास विशेषज्ञ दो बार मिल कर योजनाए बना चुके और अब तीसरी बार मिलने की कोशिश कर रहे है पर इसका निर्बाध फैलाव जारी है। हमारा देश इससे विशेषतौर पर प्रभावित है। आयातित गेहूँ के साथ इसने क्या प्रवेश किया इसे भारत भा गया। आज देश के सभी कोनो मे यह खरपतवार कहर ढा रहा है। आम लोग अब इससे लडना छोड साथ रहने की आदत बना रहे है। इससे होने वाली एलर्जी के लिये इसे नष्ट करने की बजाय दवाओ का सहारा ले रहे है। गाजर घास का मुद्दा अब मीडिया के लिये पुराना हो चुका है। उसे इसमे किसी तरह की सनंसनी नजर नही आती है। यही कारण है कि महिनो तक देश भर मे कही इसके विषय मे नही छपता। पिछले दो दशको से इसे लगातार देखने और जानने की कोशिश मे मै ही इसकी एलर्जी का शिकार हो गया। चिकित्सको की सख्त हिदायत है कि मै इससे दूर रहूँ। पर इसके समूल नाश का बीडा जो मैने उठाया है वह दूर बैठ कर तो पूरा होने से रहा। इस लेखमाला मे मै इस खरपतवार के साथ बिताये दो दशको के दौरान जो अनुभव हुये, उनके विषय मे लिखूंगा।

 (लेखक कृषि वैज्ञानिक है और वनौषधीयो से सम्बन्धित पारम्परिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण मे जुटे हुये है।)

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गाजर घास को कांग्रेस घास क्यो कहा जाता है?

गाजर घास के साथ मेरे दो दशक (भाग-2)

                    - पंकज अवधिया

 इन दो दशको मे कई सरकारे बदल गयी। गाजर घास पर व्याख्यान देने मै देश के अलग-अलग हिस्सो मे गया। लोग अक्सर पूछा करते थे कि इसे काँग्रेस वीड क्यो कहा जाता है? इस नाम को मेरे व्याख्यान के दौरान सुनकर कांग्रेस के राजनीतिक विरोधियो के चेहरे पर मुस्कान आ जाती थी। वे कई बार इसे गाजर घास न कहकर कांग्रेसीयो की घास कहते थे। मै बडी अजीब स्थिति मे होता था। अब गाजर घास तो किसी पार्टी से ताल्लुक नही रखती है ठीक मच्छरो की तरह। उससे तो देश की सभी पार्टियो के नेता और कार्यकर्ता प्रभावित होते है। कोई भेदभाव नही होता। मैने गाजर घास पर केन्द्रित अपने अंतरराष्ट्रीय ग्रुप मे जब दुनिया भर के विशेषज्ञो के सामने यह प्रश्न रखा तो बडे ही विचित्र उत्तर आये। किसी ने कहा कि यह अमेरिका से पीएल 480 योजना के तहत आयात किये गये गये गेहूँ के साथ भारत आयी और उस समय चूँकि कांग्रेस की सरकार थी इसलिये इसे कांग्रेस ग्रास का नाम मिला। कुछ ने कहा कि यह उसी तरह देश मे फैली जिस तरह एक समय कांग्रेस पार्टी फैली। ब्रिटेन के वैज्ञानिक हैरी इवांस ने तो लिख दिया कि संसद भवन परिसर मे काँग्रेस की इमारत गाजर घास की तरह है इसलिये इसका नाम कांग्रेस घास पडा (Parthenium is called Congress Weed in India because it is having a similar structure like the Congress building in Parliament Annexe, New Delhi.). मुझे तो इनमे से कोई तर्क नही जँचता। बहुत से वैज्ञानिक यह तर्क देते है कि समूह मे उगने के कारण इसे यह नाम मिला। यह तर्क अधिक ठोस लगता है।  

बहुत कम लोग यह जानते है कि गाजर घास को एक साहित्यिक नाम भी मिला हुआ है। किसने यह नाम दिया इसका पता मुझे अभी तक नही चला है। यह नाम है चटक चाँदनी। इसके सफेद फूलो को देखकर हो सकता है किसी कवि ह्र्दय ने यह नाम सुझाया हो। यह नाम वैज्ञानिक दस्तावेजो तक ही सीमित है। इसका एक अंग्रेजी नाम व्हाइट टाप भी है। हो सकता है चटक चाँदनी इसका अनुवाद हो। यदि यह सच है तो फिर इसमे कोई दो राय नही कि अनुवादित नाम मूल नाम से ज्यादा सुन्दर है।

 गाजर के समान पत्ती होने के कारण इसे गाजर घास कहा जाता है अन्यथा गाजर से इसका और कोई वास्ता नही है। पर इस गाजर के कारण कभी=कभी रोचक वाक्ये हो जाते है। इन्दौर से निकलने वाली एक पत्रिका ने गाजर घास पर मेरा आलेख प्रकाशित किया। पर गाजर घास के चित्र की जगह गाजर का चित्र डाल दिया। मैने सम्पादक महोदय को फोन किया तो पता चला कि साज-सज्जा वाले केवल शीर्षक देखकर ही चित्र डाल देते है। चूँकि उसने गाजर सुना था इसलिये इसी का चित्र डाल दिया। उसे काफी डाँट पडी। पर इसका असर उल्टा हुआ। कुछ महिनो बाद पत्रिका मे गाजर के हलवे पर किसी का लेख छपा। इस बार चित्र तो नही डाला गया पर गाजर के आगे गाजर घास का हलवा लिख दिया। अर्थ का अनर्थ हो गया।

 गाजर घास उन्मूलन का जमीनी अभियान  

शिक्षा के दौरान बहुत पढा था कि गाजर घास से एलर्जी होती है पर कभी किसी गाजर घास जनित एलर्जी के शिकार को देखा नही था। रायपुर मे एक अभियान के दौरान मैने एक रिहायशी कालोनी के निवासियो को व्याख्यान दिया और फिर मुँह, नाक, कान बाँध कर हम लोग जुट गये गाजर घास को उखाडने मे। हाथ मे कुछ ने दास्ताने पहने थे तो कुछ ने पालीथीन की झिल्लीयो को ही दास्ताने बना लिये थे। अचानक शोर हुआ। सब लोग एक बुजुर्ग व्यक्ति को घेर कर खडे हो गये। पता चला उन्हे गाजर घास से एलर्जी के कारण साँस फूल रही थी और पूरे शरीर मे चकत्ते निकल रहे थे। आनन-फानन मे डाक्टर को बुलाया गया। डाक्टर ने आते ही उन्हे डाँटा और कहा कि जब आपको पता है इससे एलर्जी है तो फिर आप यह क्यो करते है? बाद मे पता चला कि बहुत पहले से इन सज्जन को गाजर घास से एलर्जी थी और इसके लिये उन्होने चिकित्सा भी करवायी थी। पर गाजर घास को उखाडने का उनमे जुनून था। इसीलिये मेरे व्याख्यान के बाद घर वालो से नजर बचाकर वे सक्रिय हो गये। उस अभियान के बाद मैने निश्चय किया कि केवल स्वस्थ्य लोगो को ही ऐसे अभियान मे शामिल किया जाये और सम्भव हो तो एक डाक्टर भी साथ हो।

 पर यह निर्णय आसान नही था। स्वस्थ लोगो की पहचान कैसे की जाये? मेरे अभियान बिना किसी आर्थिक सहायता से होते थे और जेब से ही दास्ताने वगैरह जुगाडने पडते थे। गाजर घास से एलर्जी है या नही- यह पता लगाना आसान नही है। डाक्टर इसमे समय लेते है। कई तरह के परीक्षण किये जाते है। पैसे भी लगते है। फिर यह भी जरुरी नही कि स्वस्थ्य व्यक्ति हमेशा इस एलर्जी से बचे रहे। इसके लिये समय-समय पर जाँच करवानी चाहिये। उस समय अभियान जोरो पर था। दिन मे औसतन दस स्थानो मे व्याख्यान होते थे और फिर सब मिलकर इसे उखाडते थे। अब इतने सारे लोगो का परीक्षण हो तो हो कैसे? मैने व्याख्यानो मे यह बात उठायी। बहुत से सुझाव आये कि आम लोगो से चन्दा लिया जाये। आखिर यह अभियान उन्ही के लिये था। पर पैसे माँगना मुझे जँचा नही। पैसे की माँग बहुत से लोगो को इस जागरुकता अभियान से दूर कर सकती थी। फिर पैसा झगडे की जड भी तो है। कई स्थानो पर विशेषकर अमीरो की कालोनियो मे निवासी व्याख्यान से प्रभावित तो होते थे पर गाजर घास उखाडने की मेहनत से बचते थे। वे अपने मजदूरो और नौकरो को अभियान मे भेज देते थे। भले ही उनका स्वास्थ्य अमीरो के लिये मायने न रखे पर मुझे उनकी चिंता रहती थी। एक बार सम्पन्न इस एलर्जी का इलाज करवा सकते है पर बेचारा गरीब एक बार फँसा तो जिन्दगी भर पैसे खर्चता रहेगा।

 कई बार मुझ पर भी सन्देह किया जाता था। गाजर घास के नाम से संस्था है और फिर यह विश्व स्तर का वैज्ञानिक है। इसे इस अभियान के लिये पैसे मिलते होंगे। भला मुफ्त मे कोई क्यो अपना समय और पैसा बर्बाद करेगा? उनकी सोच भी गलत नही थी। आजकल सच मे ऐसी ही मानसिकता हो गयी है। कुछ मुझ पर आरोप लगाते थे कि आप पैसे खर्च करे और सारी व्यवस्था देखे। पर सौभाग्य से ऐसे बहुत कम लोग ही मिले। ज्यादातर लोगो ने इस अभियान को हाथो हाथ लिया। स्थानीय अखबार इसे प्रमुखता से छापते रहे और लोग अभियान के लिये सम्पर्क करते रहे। शहर के आस-पास मै अपने स्कूटर से चला जाता था और दूरी के लिये बस का सहारा था।

 कुछ समय तक अभियान चलाने के बाद यह लगने लगा कि प्रतीकात्मक रुप से गाजर घास उखाड कर दिखाना जरुरी है पर हजारो हेक्टेयर जमीन मे फैली गाजर घास को इस विधि से तो नही समाप्त किया जा सकता। यह तो रावण के सिर की तरह लगने लगी। जितना काटो उतना फैलने लगती। अभियान के कुछ सप्ताह बाद ही फिर उसका राज हो जाता। फिर अभियान तो अभियान है। सबसे कस कर मेहनत नही करवायी जा सकती। श्रमदान अपनी इच्छा से होता है। किसी ने जड सहित उखाडी तो किसी ने अधूरा छोड फोटोग्राफर की ओर रुख करना पसन्द किया। हाँ इस अभियान से लोग यह अवश्य जान जाते थे कि गाजर घास क्या है और इससे क्या नुकसान है? बहुत से सक्षम लोग अपने घरो के आस-पास से इसे उखाडवाकर अपने कर्तव्यो की इतिश्री मान लेते थे। अब समस्या यह हुयी कि बेकार जमीन मे उग रही गाजर घास को कौन उखाडे?

 

इस लेखमाला का अगला विषय

 

 

 

बेकार जमीन की गाजर घास : समस्या की जड

 

 

बेकार जमीन मे उग रही गाजर घास चिंता का मुख्य विषय है। यह आबादी सीड बैक का काम करती है। आप तो जानते ही है कि इसका एक पौधा हजारो बीज पैदा करता है और ज्यादातर बीजो मे नये पौधे को जन्म देने की क्षमता होती है। बेकार जमीन मे साल दर साल बीज तैयार होकर आस-पास के क्षेत्रो मे बिखरते रहते है। ये बीज जमीन के अन्दर भी पडे रहते है। रिहायशी इलाको मे ये बीज कई माध्यमो से पहुँचते है। इन बेकार जमीन से आने वाले वाहन बहुत से बीज अपने साथ ले आते है। वैज्ञानिक अनुसन्धान के अनुसार रेले इन बीजो के प्रसार मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अनजाने मे ही सही पर इससे बीज दूर-दूर तक फैलते रहते है। मै अपने लेखो मे श्रीलंका का उदाहरण देता हूँ जहाँ शांति सेना के आगमन से पहले गाजर घास नही थी। वहाँ के वैज्ञानिक बताते है कि शांति सेना के वाहनो के साथ भारत से गाजर घास के बीज अंजाने मे श्रीलंका पहुँचे और कुछ ही वर्षो मे ये पूरे श्रीलंका मे फैल गये। आस्ट्रेलियाई वैज्ञानिको ने सुझाया है कि गाजर घास प्रभावित क्षेत्रो से आने वाली हर गाडी को अच्छे से धोया जाये ताकि बीजो का प्रसार न हो पर यह जमीनी स्तर पर सम्भव नही जान पडता है।

 

आम तौर पर उन भागो मे जहाँ औद्योगिक इकाईयाँ होती है इस खरपतवार का प्रकोप देखा जाता है। इसके पीछे भी यही कारण है। वाहनो की सतत आवाजाही से बीज फैलते जाते है। भिलाई मे गाजर घास का जबरदस्त फैलाव इसका सशक्त उदाहरण है। बस्तर के लोहाण्डीगुडा मे गाजर घास की संख्या नही के बराबर थी। अब वहाँ स्टील प्लाँट लगने वाला है। अचानक ही वाहनो की आवाजाही बढ गयी है। परिणामस्वरुप अब गाजर घास वहाँ पैर पसारने लगी है। उडीसा के नियमगिरि मे भी यही दिख रहा है। जैव-विविधता से पूर्ण इस पर्वत पर गाजर घास नही थी पर जब से बाक्साइट खनन के नाम पर मनुष्य़ॉ की गतिविधियाँ बढी है तब से आस-पास के शहरो से ट्रको के माध्यम से गाजर घास के बीज पर्वत पर आ रहे है और तेजी से फैल रहे है। थोडे ही समय मे स्थिति विकराल हो जायेगी। जिस तरह गाजर घास देश के दूसरे इलाको मे जैव-विविधता और देशी वनस्पतियो के लिये सिरदर्द बनी हुयी है उसी तरह अब नियमगिरि मे भी अब इसका ताँडव होने वाला है।

 

रिहायशी कालोनियो मे लोग अपने घर मे वाटिका तैयार करते है। उसके लिये मिट्टी की आवश्यकत्ता होती है। यह मिट्टी कहाँ से आती है? उन्ही बेकार जमीनो से जहाँ गाजर घास उगती है। मिट्टी के साथ गाजर घास के असंख्य बीज आ जाते है। इस तरह कालोनियो मे हर साल बीज पहुँचते रहते है और शहर के अन्दर फैलते रहते है। अब एक-एक को पकडकर कैसे समझाया जाये? कुछ मान भी जाये तो उनका प्रश्न होता है कि आखिर मिट्टी कहाँ से लाये? दूरस्थ गाँवो से जहाँ गाजर घास नही है। यह उत्तर उन्हे संतुष्ट नही कर पाता है। यही भी नंगा सच है कि दूरस्थ गाँव भी अब इससे नही बचे है। फिर आम लोग मिट्टी न लाये तो सार्वजनिक उद्यानो मे मिट्टी आती रहती है। बडे पैमाने पर। इससे भी गाजर घास का प्रवेश शहर के अन्दर होता रहता है। गाजर घास के फैलाव को रोकने के लिये व्यापक पैमाने पर कार्य योजना बनाने की जरुरत है। यह तभी सम्भव है जब इसकी गम्भीरता को समझा जाये। आम जनता सरकारो पर दबाव बनाये। यह भी कडवा सच है कि इस तरह की कार्य योजनाओ को अच्छी नजरो से नही देखा जाता। आम लोग सोचते है कि वैज्ञानिक और योजनाकार किसी भी माध्यम से पैसा डकारने की फिराक मे है और इसलिये इतनी बडी योजना बना रहे है। आज भ्रष्टाचार देश के रोम-रोम मे व्याप्त है। गंगा की सफाई जैसी बडी योजनाओ पर करोडो खर्च होने के बाद भी नतीज सिफर ही रहा है। आम लोगो का गाजर घास की कार्ययोजना को भी इसी नजरिये से देखना गलत नही है।   

 

मै अपने व्याख्यानो मे गाजर घास की तुलना सीमा पार के आतंकवादियो से करता हूँ और कहता हूँ कि आप देश के अन्दर इन्हे जितना भी मार लीजिये कुछ नही होगा। जब तक सीमा पार के ट्रेनिग कैम्प नष्ट नही किये जायेगे तब तह कहर जारी रहेगा। सीमा पार के कैम्प गाजर घास के नजरिये से बेकार जमीन मे उग रही गाजर घास है। श्रोता बडी आसानी से इस उदाहरण से सारी बात समझ जाते है।

 

विदेशी कीट जाइगोग्रामा पर नजर

वनस्पतियो विशेषकर खरपतवारो को खाने वाले कीटो मे मेरी सदा से रुचि रही है। मैने ब्लूमिया नामक खरपतवार पर क्राइसोलिना नामक कीट को न केवल खोजा बल्कि लम्बे समय तक इस पर काम भी किया। पर कीटो से खरपतवार नियंत्रण पर मै संश्य की स्थिति मे रहा। दुनिया भर के सन्दर्भ साहित्य बताते है कि कैसे कीटो को विशेष खरपतवारो के लिये छोडा गया और शीघ्र ही उन्होने अपना रंग दिखाया और दूसरी वनस्पतियो को खाने लगे। ये मित्र से शत्रु बन गये। कीटो से खरपतवार नियंत्रण हमेशा ही से खतरो भरा रहा है। गाजर घास के नियंत्रण के लिये जाइगोग्रामा नामक कीट का उपयोग होता है। हमारे देश मे इस पर गहन अनुसन्धान हुये है। शुरु मे यह हल्ला हुआ कि गाजर घास के लिये छोडा गया जाइगोग्रामा सूर्यमुखी को नुकसान पहुँचा रहा है। एक जाँच समिति बनायी गयी जिसने फैसला दिया कि ऐसा कुछ नही है। उसके बाद इस कीट को प्रकृति मे गाजर घास के नियंत्रण के लिये छोडे जाने की अनुमति मिल गयी। हमारे वैज्ञानिको ने इसे बहुत सी वनस्पतियो पर आजमाया और बताया कि ये किसी भी परिस्थिति मे गाजर घास के अलावा कुछ नही खाते। आज देश भर मे इन कीटो को देखा जा सकता है। गाजर घास की तरह ही यह कीट भी विदेशी है।

 

कुछ वर्षो पहले मैने अपने ग्रुप के माध्यम से यह प्रश्न किया कि कितनी वनस्पतियो पर इस कीट को परखा जा चुका है? तो जवाब मिला सैकडो पर हमारे देश मे तो हजारो वनस्पतियाँ है। ज्यादातर वनस्पतियाँ वनो मे है और दिव्य औषधीय गुणो से भरपूर है। क्या इन सभी पर इस कीट के परीक्षण किये गये है? वैज्ञानिक बगले झाँकने लगे और बोले सब पर परीक्षण कहाँ सम्भव है? आर्थिक महत्व की फसलो और कुछ पेडो पर इसका परीक्षण हुआ है। फिर इसी आधार पर इस छोड दिया गया है। मै इस आधे-अधूरे परीक्षण के पक्ष मे नही हूँ। कालांतर मे कही ये अभिशाप न बन जाये इसकी मुझे अधिक चिंता है। आज कृषि वैज्ञानिक फसलो पर अनुसन्धान तक सीमित है। जबकि ये कीट जंगलो मे भी फैले है। इनकी संख्या मे लगातार वृद्धि हो रही है। क्या कभी किसी ने यह जानने की कोशिश की है कि देशी चिडिया जब इस कीट को खाती है तो इस नयी कीट से उस पर और अंतोगत्वा उसकी आबादी पर क्या असर पडता है? प्रकृति मे बहुत से उपयोगी कीट भी है। कही ये विदेशी कीट इन कीटो पर नकारात्मक प्रभाव तो नही डाल रहे है? कौन हर जगह इन पर नजर रखे हुये है? आदि-आदि बहुत से प्रश्न है जो सिर उठाये खडे है। इनका जवाब किसी के पास नही है। जैसे ही इस कीट ने कुछ गलत किया अचानक ही हंगामा खडा हो जायेगा। मेरे बहुत से वैज्ञानिक मित्र इन प्रश्नो को सुनकर कह देते है कि यह पूरी तरह से सेफ है पर वे बिना किसी वैज्ञानिक प्रमाण के ये बात कहते है। अब चूँकि वे वैज्ञानिक है इसलिये बिना परीक्षण ही राय देने लगे और हम मानने भी लगे-ये कैसे हो सकता है? हमारे देश मे मुठ्ठी भर लोग ही इन विषयो पर निर्णय लेते है। इन निर्णयो मे आम लोगो की राय नही ली जाती है। समस्या आती भी है तो फिर ये मुठ्ठी भर लोग ही उसे सुलझा लेते है। अपने किसी को फँसने नही देते है। यही कारण है कि मेरे द्वारा उठाये गये प्रश्न अभी तक अनुत्तरित है और मेरी आवाज नक्कारखाने मे तूती की आवाज साबित हो रही है।

 

अंतरराष्ट्रीय एलिलोपैथी सम्मेलन मे भाग लेने मै धारवाड गया तो इन कीटो के प्रति अपना मोह नही छोड पाया। कुछ कीट एकत्र कर लिये और उन्हे लेकर वापस रायपुर लौट गया। रास्ते मे ट्रेन मे सहयात्रियो के लिये ये कौतूहल का विषय रहा। मुझे इस बहाने उन्हे गाजर घास के बारे मे बताने का मौका मिल गया। रायपुर आकर मैने अपनी प्रयोग शाला मे इन कीटो को रखा और कई प्रकार के परीक्षण किये। नयी वनस्पतियो को खिलाया फिर पूर्ण सूर्य ग्रहण के दौरान कीटो पर इसका असर देखने के लिये मैने जिन कीटो को चुना उनमे जाइगोग्रामा भी था। उन दिनो मै अपने प्लास्टिक खाने वाले कीट पर शोध कर रहा था। इन्हे भी इस कीट के साथ रखा। मै इन्हे प्रकृति मे छोडने से बचता रहा।

जाइगोग्रामा और आम लोग

 

जैसे-जैसे जाइगोग्रामा ने देश मे फैलना शुरु किया देश भर से गाजर घास को खाने वाले नये कीट की खोज के दावे सामने आने लगे। मुझे ढेरो पत्र मिले जिनमे यह दावा किया गया था कि उन्होने गाजर घास को खाने वाले कीडे को खोज निकाला है और इसके लिये उन्हे इनाम मिलना चाहिये। जब उन्हे बताया जाता कि इसे वैज्ञानिको ने ही छोडा है तो वे दुखी हो जाते। इस क़ीट को छोडने के कुछ समय बाद ही यह बात स्पष्ट हो गयी कि अकेले इसके बूते पर गाजर घास का समूल नाश सम्भव नही है। जबलपुर जहाँ इस कीट पर सबसे अधिक अनुसन्धान हुआ है, मे गाजर घास का फैलाव बदस्तूर जारी रहा। वहाँ असंख्य कीट छोडे जा चुके है। यही स्थिति कमोबेश पूरे देश की है। यह कीट पूरे वर्ष सक्रिय नही रहते पर गाजर घास साल भर न केवल सक्रिय रहती है बल्कि बीजोत्पादन भी करती रहती है। देश की अलग-अलग वातावरणीय परिस्थितियो ने भी इसके जीवन-चक्र पर प्रभाव डाला है। प्रयोगशाला मे जिस तेजी से ये गाजर घास को खाते दिखते है प्रकृति मे ऐसा नही होता है। इस कीट को बाँटने का कार्य अब भी जोर-शोर से जारी है। बहुत से अनुसन्धान संस्थान कीट मुहैया करवा रहे है और देश भर अभियान चलाकर इन्हे छोडा जा रहा है।

 

आस्ट्रेलिया मे कई उपयोगी कीटो की पहचान की गयी पर भारत मे जाइगोग्रामा का प्रयोग ही हो रहा है। यह बडे आश्चर्य का विषय है कि गाजर घास को खाने वाले देशी कीट की अभी तक खोज नही हो पायी है। देशी कीट देश की वातावरणीय परिस्थितियो मे विदेशी कीटो से अधिक दक्षता से काम कर सकते है।

 

 

मैने अभियान के दौरान बहुत बार जाइगोग्रामा के विषय मे चर्चा की। कीटो से वैसे ही आम लोग दूर भागते है। उनके मन मे संश्य रहता है और वे तरह-तरह के सवाल पूछते है। एक बार भिलाई मे एक अभियान के बाद कुछ कीट छोडे गये। दूसरे दिन आस-पडोस के लोग शिकायत लेकर आ गये कि इस कीट ने काट लिया है। प्रभावित लोगो को देखा तो पता चला कि दूसरे कीट ने काटा था। काफी समझाने बुझाने के बाद वे शांत हुये।  

 

गाजर घास का रासायनिक नियंत्रण : समाधान या एक नयी समस्या?

 

गाजर घास के रासायनिक नियंत्रण पर दुनिया भर मे बहुत शोध हुये है। यही कारण है कि आज हमारे वैज्ञानिको के पास रसायनो की लम्बी सूची है। इनमे से ज्यादातर रसायन प्रभावी ढंग से गाजर घास के पौधो को नष्ट कर देते है। अलग-अलग फसलो के लिये अलग-अलग रसायन उपलब्ध है। गाजर घास के साथ यदि दूसरे खरपतवारो को नष्ट करना है तो विशेष रसायन है। आज भी नये रसायनो का विकास हो रहा है और बडी संख्या मे विशेषज्ञ नवीन अनुसन्धान मे लगे है। मै कभी भी रसायनो का समर्थक नही रहा। जैसा मैने पहले लिखा है गाजर घास हजारो हैक्टेयर जमीन मे फैली है। इतने बडे क्षेत्र मे रसायनो का उपयोग मतलब एक नयी मुसीबत को आमंत्रण। एक समस्या को हटाने दूसरी समस्या को विकल्प के रुप मे सामने लाना भला कहाँ की समझदारी है? वैसे भी रसायनिक खेती के दुष्परिणाम हम देख ही रहे है। न अन्न सात्विक रहा और न ही जल की शुद्धता बरकरार रह पा रही है। ऐसे मे गाजर घास के लिये बडी मात्रा मे धरती के सीने पर रसायनो का अम्बार सही नही जान पडता है। यही कारण है कि मै अपने अभियानो मे रसायनो के पक्ष मे कम बोलता हूँ। रसायन पर्यावरण के लिये अभिशाप होने के अलावा महंगे भी है। बडे किसान इनका प्रयोग कर लेते है पर छोटे किसान इसमे सफल न्ही हो पाते है। फिर बेकार जमीन मे गाजर घास को नष्ट करने मे आने वाला व्यय भला कौन उठायेगा?

 

अनुसन्धानकर्ताओ के बीच गाजर घास के रासायनिक नियंत्रण के पक्षधर लोगो का एक गुट है। इसमे काफी रसूखदार लोग है। यही कारण है कि गाजर घास के रासायनिक नियंत्रण पर शोध को ही अधिक प्रोत्साहन दिया जा रहा है। इस प्रोत्साहन के पीछे वे रसायन बनाने वाली कम्पनियाँ भी है जिन्हे गाजर घास से जबरदस्त मुनाफा होता है। वे ऐसे शोधो को प्रायोजित करती है। समय-समय पर आयोजित होने वाले सम्मेलनो मे भी इन कम्पनियो की सक्रियता देखी जा सकती है। कभी-कभी लगता है कि हमारे विशेषज्ञ निज स्वार्थ त्याग कर कम्पनियो की बजाय किसानो को सम्मेलनो मे सक्रिय कर पाते तो इस देश का भला हो जाता है सही मायने मे।

 

देश मे बहुत से ऐसे विशेषज्ञ भी है जो कि अन्य प्रकृति मित्र उपायो की सहायता से गाजर घास का प्रबन्धन करना चाहते है पर सम्मेलनो मे उनकी आवाज रसायनो के पक्षधरो द्वारा दबा दी जाती है। हाल ही मे एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन मे जब मैने गाजर घास की सम्भावित उपयोगिता पर अपने विचार रखे तो एक जाने-माने रसायन समर्थक वैज्ञानिक मुझे सीधी चुनौती देते हुये बोले कि गाजर घास के उपयोग सुझाकर आप लोगो के मन से इसका डर खत्म नही करे। सभी लोगो को डराये। वे आम लोगो मे भय उत्पन्न करना चाहते थे ताकि भयादोहन कर रसायन बेचे जा सके। उस समय तो अन्य वैज्ञानिको ने उन्हे चुप करा दिया पर बाहर निकल कर वे लगातार मुझ पर दबाव बनाते रहे।

 

कुछ वर्षो पहले मुझे नागपुर बुलाया गया। एक कंपनी का दावा था कि उसने गाजर घास के नियंत्रण के लिये एक नया रसायन ईजाद किया है। वे रसायन का परिचय देने को तैयार नही थे। उन्होने क्षेत्रीय अनुसन्धान संस्थान की रपट दिखायी जिसमे उनके उत्पाद की अनुशंसा की गयी थी। उन लोगो ने मेरे सामने गाजर घास पर इस नये रसायन को डाला। कुछ समय मे इसका असर दिखने लगा। अपने अनुभव के आधार पर मैने कहा कि इसमे कुछ भी नया नही है। यह तो पैराक्वाट नामक रसायन है। उन्होने कहा नही इसमे वनस्पतियाँ है। मैने डब्बे को सूंघा तो मेरा शक और बढ गया। बाद मे उनमे से एक असंतुष्ट ने बताया कि बाजार मे मिलने वाले रसायन मे नीम मिलाकर इसे हर्बल का नाम दे दिया गया है। उसने यह भी दावा किया कि विदर्भ मे इसे किसानो के बीच बेचा जा रहा है बहुत अधिक कीमत पर। बाद मे छत्तीसगढ मे भी मैने इसके विषय मे सुना। पता चला कि सम्बन्धित अधिकारियो की झोली भरकर वे बेधडक इसे बेच रहे है। किसान और आम लोग इसका छिडकाव कर रहे है और सस्ते मे उपलब्ध रसायन हर्बल के नाम पर ऊँचे दामो पर बिक रहा है। गाजर घास पर आयोजित द्वीतीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन मे मैने इन्हे आस्ट्रेलियाई वैज्ञानिको के आस-पास मंडराते देखा इस आस मे कि शायद उस देश मे सप्लाई का बडा आर्डर मिल जाये। पर जल्दी ही उन्हे समझ आ गया कि भारत ही तरह आस्ट्रेलिया मे उनकी दाल नही गलने वाली।

 

स्कूली बच्चो से लेकर छोटी-मोटी कम्पनियाँ लगातार विभिन्न संचार माध्यमो से ये दावा करती रहती है कि उन्होने गाजर घास को नष्ट करने का रसायन विकसित किया है। वे इनाम और सम्मान की प्रतीक्षा मे रहते है। पर यह डगर इतनी आसान नही है। मुझे अपने प्राध्यापक की कही बात याद आती है कि किसी भी पौधे पर एसिड डाल देने से वह मर जाता है पर इसका मतलब यह नही है कि किसानो को एसिड डालने की राय दे दी जाये। यह देखना निहायत जरुरी है कि यह कितना प्रभावी है, इसमे कितनी लागत आयेगी, क्या यह धरती के लिये सुरक्षित होगा? आदि-आदि। आम तौर पर मै ऐसे दावे करने वालो को सबसे पहले धन्यवाद देता हूँ कि कम से कम उन्होने गाजर घास की समस्या के लिये कुछ पहल तो की। फिर उन्हे राय देता हूँ कि वे राष्ट्रीय खरपतवार अनुसन्धान संस्थान जबलपुर से सम्पर्क करे और नियमानुसार अपने उत्पाद का परीक्षण कराये। आम तौर पर अविष्कारक को यह डर रहता है कि कही ऐसे संस्थानो से उनके उत्पाद की चोरी न हो जाये। आम जनता के बीच ऐसी बहुत सी बाते फैली होती है और ज्यादातर पूर्व मे घटित हुयी घटनाओ के आधार पर ही कही जाती है। इसके लिये इन संस्थानो ने कई पारदर्शी नियम बनाये है जिनसे निश्चिंत होकर उत्पादो का परीक्षण करवाया जा सकता है। यदि उत्पाद कारगर है तो वे अपनी रपट देंगे जिसके आधार पर आप उसे बाजार मे प्रस्तुत कर सकते है। यहाँ यह भी बताना जरुरी है कि कई बार शिकायत आती है कि रपट मे छेडछाड की जाती है। निज अविष्कारक की जगह बडी कम्पनियो को अधिक महत्व दिया जाता है। यह भी कहा जाता है कि इस परीक्षण के पैसे लगेंगे और हर अविष्कारक के लिये यह सम्भव नही हो पाता है। ऐसे जटिलताए उन्हे निरुत्साहित कर देती है और उनके उत्पाद अखबारो तक ही सीमित होकर रह जाते है। इन जटिलताओ को दूर करने की आवश्यकता है। 

 

मै इस लेख भिलाई के युवा अविष्कारक श्री अमरीक सिंग की चर्चा करना चाहूंगा। उन्होने आग की सहायता से सस्ते मे गाजर घास नियंत्रण का उपाय खोजा। फिर इस अविष्कार के दम पर उन्होने नगर निगम मे गाजर घास उन्मूलन का ठेका लिया। चूँकि यह उनकी अपनी तकनीक थी इसलिये उन्होने पैसे भी बचा लिये और गाजर घास पर नियंत्रण भी पा लिया। मुझे जब इस अविष्कार की खबर लगी तो उनसे सम्पर्क किया। मैने अहमदाबाद स्थित एक जाने-माने संस्थान के विषय मे उन्हे बताया और आवेदन करने को कहा। यह संस्थान नव उद्यमियो को प्रोत्साहित करता है। इस अविष्कार के अलावा दूसरे अविष्कार भी उन्होने प्रविष्टी के रुप मे उन्हे भेजे। काफी दिनो बाद उनसे इसकी वीडियो रिकार्डिंग माँगी गयी। फिर अचानक ही कह दिया गया कि वे इस आवेदन के योग्य नही है। मैने पता किया तो उनका जवाब था कि चूँकि अमरीक सिंग पढे-लिखे है इसलिये हम उनकी मदद नही कर सकते। संस्थान अशिक्षित लोगो को प्रोत्साहित करता है। अमरीक ने कोई इंजीनियरिंग की शिक्षा नही ली है। उन्होने कामर्स की पढायी की है और इस शिक्षा का उनके अविष्कार से कुछ लेना देना नही है। वे बडे निराश हुये और साथ ही मै भी। मैने बहुत से लेख उनके कार्यो पर लिखे पर अभी तक कुछ ठोस मदद नही कर पाया। आज भी वे अपने अविष्कारो की मदद से आजीविका चला रहे है। उनके इस हुनर की तारीफ करने वाले बहुत कम है। आज समय भले ही उनके साथ न हो पर आने वाला कल उनका होगा-ऐसा मेरा विश्वास है।    

 

नमक के घोल से गाजर घास नियंत्रण कितना उचित?

 

गाजर घास के नियंत्रण के लिये नमक के घोल का उपयोग भी रासायनिक नियंत्रण की श्रेणी मे आता है। आम तौर पर वैज्ञानिक सलाह दी जाती है कि बीस प्रतिशत नमक के घोल का छिडकाव गाजर घास को नष्ट कर सकता है। यह अविश्वसनीय लगता है पर है बहुत कारगर। नमक का घोल डालते ही कुछ ही मिनटो मे असर दिखना आरम्भ हो जाता है। थोडे समय मे यह खरपतवार पूरी तरह नष्ट हो जाता है। किसी भी अवस्था मे यह प्रयोग बडा ही उपयोगी होता है। आयोडीन युक्त नमक की जगह जो साधारण नमक बाजार मे मिलता है उसका प्रयोग ही सस्ता पडता है। मैने इस विधि का प्रदर्शन कई बार किया है। रिहायशी इलाको मे जहाँ आप न अन्य रसायन उपयोग कर सकते है और न ही कीटो को छोड सकते है, यह विधि कारगर है। मैने अपने घर के आस-पास इसी विधि का प्रयोग किया है। बडे क्षेत्र मे नमक का प्रयोग ठीक है या नही-इस बारे मे वैज्ञानिक मतैक्य नही है। बहुत से वैज्ञानिक यह मानते है कि इतना नमक प्रकृति के लिये समस्या नही है। यह वर्षा के जल मे घुलकर तनु हो जायेगा। इसलिये इस विधि का प्रयोग किया जा सकता है। इतनी मात्रा मे नमक दूसरे जीवो और वनस्पतियो के लिये अभिशाप बन सकता है-ऐसा दावा करने वाले वैज्ञानिक भी है। वे इसके प्रयोग के सख्त विरोधी है। मुझे लगता है कि पक्ष और विपक्ष की खेमेबाजी छोडकर सही मायने मे अनुसन्धान कर यह पता लगाना चाहिये कि क्या सचमुच नमक का इस तरह प्रयोग नुकसान करता है? यदि हाँ तो किस तरह और क्या ऐसे उपाय किये जा सकते है जिससे नमक का प्रयोग भी हो सके और धरती को नुकसान भी न हो? मुझे युवा शोधकर्ताओ  से बडी उम्मीदे है। आशा है वे इस तरह के आवश्यक शोधो पर ध्यान देंगे बजाय इसके कि एक ही तरह के शोधो को बार-बार किया जाये।        

 

यह विडम्बना ही है कि गाजर घास के रासायनिक नियंत्रण पर शोध के नाम पर अब तक करोडो रुपये पानी की तरह बहाये जा चुके है पर गिने-चुने ही ऐसे प्रयोग हुये है जो यह बता सके कि इन रसायनो के प्रयोग से पर्यावरण को कितना नुकसान पहुँच रहा है? कृषि वैज्ञानिक यह कहकर बच सकते है कि यह शोध उनके कार्यक्षेत्र से बाहर है पर यह सही तर्क नही है। दूसरे क्षेत्र के वैज्ञानिको के साथ मिलकर उन्हे शोध करना चाहिये और परिणाम आने से पहले रसायन विशेष के वैज्ञानिक अनुमोदन से बचना चाहिये। आम तौर पर यह भी देखा जाता है कि विदेशो मे किये गये अनुसन्धान का हवाला देकर यह जताने की कोशिश की जाती है कि अमुक रसायन का पर्यावरण पर विपरीत प्रभाव नही पडता है। पर हमारे देश की परिस्थितियाँ अलग है इसलिये रसायनो को भारतीय परिस्थितियो मे जाँचने की आवश्यकत्ता है। आज पर्याप्त जगरुकता के अभाव मे और आम जनता द्वारा कृषि अनुसन्धानो मे अधिक रुचि न लिये जाने के कारण सारा तंत्र निरंकुश सा हो गया है। इस पर नकेल कसना देश हित मे होगा।

 

नमक के प्रयोग पर प्रश्न उठाने वालो मे सुश्री मेनका गाँधी का भी नाम है। इंडिया टीवी पर अपने कार्यक्रम मे उन्होने गाजर घास पर मेरे कार्यो पर एक कार्यक्रम प्रस्तुत किया था। उसमे उन्होने नमक के प्रयोग पर प्रश्न खडे किये थे। आज तक ये प्रश्न वैज्ञानिक तौर पर अनुत्तरित है। नमक के प्रयोग की अपनी सीमाए भी है। आप इसे बेकार जमीन मे उपयोग कर सकते है पर फसलो के बीच उग रही गाजर घास के लिये यह उपयोगी नही है। नमक का घोल अन्य वनस्पतियो को भी मार सकता है। फिर नमक का घोल यंत्रो को जल्दी खराब कर देता है। अपनी पीठ पर स्प्रेयर लादे जब हम कालोनियो मे निकलते थे तो बडे उत्साह मे होते थे पर जल्दी ही नमक के साथ रहने का दुष्प्रभाव हमे दिखने लगता था। आम लोग और कार्यकर्ता नमक के साथ बहुत देर तक काम नही कर पाते थे। अपने अभियान के लिये मै एक बार बडी मात्रा मे साधारण नमक खरीद लेता था फिर उसे कमरे मे रख दिया जाता था। बरसाती नमी से मिलकर इस नमक ने कमरे के फर्श को खराब करना आरम्भ कर दिया। बीस प्रतिशत नमक का घोल कहने पर श्रोताओ के लिये कुछ ज्यादा की तकनीकी हो जाता था। इसलिये उन्हे समझाया जाता था कि पाँच ग्लास पानी मे एक ग्लास साधारण नमक मिलाया जाये।

 

मेरे साथ पढा एक मित्र एक बडी कम्पनी मे विशेषज्ञ हो गया है। यह कम्पनी गाजर घास को मारने के लिये रसायन बनाती है। मेरे रसायन विरोधी लेख उनकी बिक्री पर कुछ विराम लगा देते थे इसलिये एक दिन उसने फोन किया कि जब आम लोग मच्छर से लेकर दीमको को मारने के लिये रसायनो का प्रयोग कर रहे है तो फिर गाजर घास के रासायनिक नियंत्रण के खिलाफ ही हल्ला क्यो? मैने उससे कहा कि वह यह प्रमण दिखा दे कि उसके रसायन भारत की धरती को प्रदूषित नही करेंगे तो मै खुशी से उनके उत्पाद को लोगो को अपनाने कहूँगा। रही बात अन्य रसायनो मे प्रयोग की तो मैने उससे मेरे लेख पढने को कहा जिसमे मै लगातार प्रकृति मित्र उपायो को अपनाने की सलाह देता हूँ। ग्रामीण भारत आज भी काफी हद तक रसायनो से दूर है इसलिये अस्पतालो से भी दूर है और आरोग्यता बनी हुयी है।

 

भारत मे अकेले गाजर घास को मारने वाले रसायनो का करोडो का बाजार है और यह बढता ही जा रहा है। मै सदा ही अपने लेखो से सभी लोगो से यह अनुरोध करता हूँ कि इस पर कडी नजर रखी जाये। यह तो आप देख ही रहे है कि रसायनो का प्रयोग तो बढ रहा है पर गाजर घास भी बढ  रही है। यह अच्छा संकेत नही है।    

 

सूक्ष्मजीवो से गाजर घास नियंत्रण: शोध ढेरो पर नतीजा सिफर

 

दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है-इसी मूल सिद्धांत पर खरपतवारो का जैविक नियंत्रण किया जाता है। आम तौर पर आप अपने आस-पास उग रहे खरपतवारो को ध्यान से देखेंगे तो उनमे कई तरह के रोग नजर आयेंगे। रोग विशेषज्ञ इन रोगो मे रुचि लेते है और अपने अनुसन्धानो की मदद से यह पता लगाने की कोशिश करते है कि क्या यह रोग खरपतवार विशेष को नष्ट करने मे सक्षम है? यदि हाँ, तो कितने समय मे? यह भी जानने की कोशिश की जाती है कि क्या ये रोग सिर्फ उस खरपतवार तक ही सीमित है या दूसरी वनस्पतियो को भी प्रभावित करते है? जब ऐसे रोग की पहचान हो जाती है जो केवल खरपतवार तक ही सीमित है तब उस पर गहन अनुसन्धान आरम्भ होते है जिसका उद्देश्य ऐसे उत्पाद का विकास करना होता है जिसके प्रयोग से स्वस्थ खरपतवार को रोगग्रस्त कर नष्ट किया जा सके। पौध रोग के कारक सूक्षमजीव भी होते है। इनकी पहचान कर प्रयोगशाला मे इनकी संख्या मे वृद्धि की जाती है फिर इनका छिडकाव किया जाता है। हमारे देश मे इस विषय पर जितने शोध हुये है उतने पूरी दुनिया मे नही हुये है। गाजर घास को इन सूक्षम जीवो के माध्यम से नष्ट करने का दावा करने वाले सैकडो शोध परिणाम पुस्तकालयो मे पडे है पर फिर भी जमीनी स्तर पर एक भी उत्पाद उपलब्ध नही है। इन शोधो पर बहुत पैसे खर्च किये जा चुके है पर नतीजा सिफर ही रहा है। ज्यादातर सूक्षमजीवी प्रयोगशाला की नियंत्रित दशा मे अच्छे से काम करते है पर खुले आसमान के नीचे टाँय-टाँय फिस्स हो जाते है। नये प्रयोगो के लिये अब भी पैसे दिये जा रहे है। मेरा मानना है कि असफल प्रयोगो पर एक बार फिर से विचार किया जाये और असफलता के कारणो का पता लगाया जाये। इस विवेचना से नयी दिशा मिलेगी और हो सकता है कि असफल प्रयोग देश के कुछ काम आ जाये। वैज्ञानिको को प्रयोगशाला से बाहर निकलकर खेत की स्थितियो मे अपने प्रयोग की सफलता दिखाने के लिये प्रेरित करना चाहिये। ऐसे प्रयोग जिसमे देश का पैसा लगा हो केवल अकादमिक उपलब्धियो तक ही सीमित नही रहने चाहिये।

 

मैने अपने वानस्पतिक सर्वेक्षणो के दौरान गाजर घास मे नाना प्रकार के रोग देखे। कुछ के चित्र तो मैने अपनी वेब साइट पर भी प्रकाशित किये। चूँकि यह मेरा विषय नही है इसलिये मैने एक पादप रोग विशेषज्ञ से मदद माँगी। उन्होने कहा कि यह तो आम रोग है और इसका अधिक महत्व नही है। बाद मे पता चला कि उन्होने इसपर काम करके शोध पत्र प्रकाशित किया अपने नाम से और फिर तीन वर्षो का एक प्रोजेक्ट भी लिया। मै उनसे मिलने पहुँचा तो वे कन्नी काटने लगे। मैने उनसे साफ शब्दो मे कहा कि आपने जो किया उससे मुझे शिकायत नही पर अब गहनता से इस पर अनुसन्धान करके कोई उपयोगी उत्पाद विकसित करिये। पर जैसा अक्सर होता है प्रोजेक्ट के पैसे से वे मजे करते रहे है और फिर तीन वर्षो बाद आनन-फानन मे रपट बनाकर प्रोजेक्ट की अवधि बढाने की माँग कर डाली। दिल्ली मे बैठे विशेषज्ञो ने जान लिया इस गोरखधन्धे को और उन्हे आगे काम करने की अनुमति नही मिली। पूरी योजना वही की वही रह गयी। इस प्रोजेक्ट के बाद उन्हे दूसरा प्रोजेक्ट मिल गया। उनकी पदोन्नति भी हो गयी और अब उनके जीवन-परिचय मे गाजर घास का यह प्रोजेक्ट प्रमुखता से दिखता है। ऐसे वैज्ञानिक भला देश के किस काम के। आम जनता की गाढी कमायी शोध मे नाम पर यूँ जाया करना भारतीय अनुसन्धान की वर्तमान दशा और दिशा के लिये उत्तरदायी कारणो मे से एक है।

 

मै एक ऐसे विशेषज्ञ को भी जानता हूँ जिन्होने कई सूक्षमजीव आधारित उत्पादो पर बकायदा पेटेंट ले रखा है। उन्होने जिन खरपतवारो पर अनुसन्धान किया उनमे गाजर घास एक है। मैने उनसे बहुत बार अनुरोध किया कि आप इन उत्पादो को जनहित मे सामने लाये ताकि इस खरपतवार से मुक्ति मिल सके। उनका जवाब होता है यह काम मेरा नही है। यदि कोई कम्पनी इस उत्पाद को खरीदने आयेगी तो मै उन्हे यह दे दूंगा। अब मै तो सडक पर आकर इसे मुफ्त मे आम लोगो को नही दे सकता। अभी तक किसी कम्पनी ने उनके उत्पादो मे रुचि नही दिखायी है। इससे यह भी लगता है कि कही इन उत्पादो का महत्व भी अकादमिक उपलब्धियो तक ही सीमित तो नही है।

 

गाजर घास पर धारवाड मे आयोजित प्रथम अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन मे ब्रिटेन से एक जाने-माने वैज्ञानिक आये थे। उन्होने सूक्षमजीवो के माध्यम से गाजर घास के नियंत्रण पर अपना शोध कार्य प्रस्तुत किया था। उन्होने भारतीय शोधो पर भी रुचि दिखायी थी। बाद मे कुछ वैज्ञानिक विदेश भी गये पर लाभ के नजरिये से देखे तो इससे देश को कुछ भी लाभ नही हुआ। लाभ केवल विशेषज्ञो तक ही सीमित रहा।

 

प्रकृति मे अपना वर्चस्व कायम रखने के लिये सभी पौधो ने अपनी-अपनी व्यस्था कर रखी है। यह व्यवस्था प्रकृति प्रदत्त है। पौधे तरह-तरह के रसायन बनाते है और अपने विभिन्न पौध भागो के माध्यम से आस-पास छोडते है। इन रसायनो को एलिलोरसायन कहा जाता है। ये रसायन आस-पास उग रहे दूसरी जाति के पौधो को या तो उगने नही देते या फिर उन्हे नष्ट कर देते है। प्रकृति मे पौधे विशेष के फैलाव को देखकर यह अन्दाजा हो जाता है कि वे एलीलोरसायन मे समृद्ध है। पौधो और अन्य जीवो विशेषकर सूक्ष्मजीवो के इस पारस्परिक सम्बन्धो जो कि एलिलोरसायन के माध्यम से होते है को विज्ञान की नयी शाखा एलिलोपैथी के माध्यम से समझने की कोशिश की जाती है। हर जगह विपरीत से विपरीत वातावरणीय परिस्थितो मे भी अच्छे से उस लेने के गाजर घास के अनोखे गुण ने उन वैज्ञानिको का ध्यान आकर्षित किया जो कि एलिलोपैथी पर शोध कर रहे थे। सतत अनुसन्धानो के बाद बहुत से एलिलोरसायनो की पहचान कर ली गयी। इन शोधो के बाद अब वैज्ञानिक सबूत के साथ यह बता सकते है कि गाजर घास कैसे दूसरे पौधो को प्रभावित करता है।

 

देशी वनस्पतियो से गाजर घास नियंत्रण

 

प्रकृति ने सबका दुश्मन बनाया है। जहाँ एक ओर गाजर घास कई आर्थिक महत्व की वनस्पतियो पर विपरीत प्रभाव डालती है वही बहुत सी ऐसी वनस्पतियाँ है जो गाजर घास पर विपरीत प्रभाव डालने मे सक्षम है। इन वनस्पतियो को बढावा देकर गाजर घास को फैलने से रोका जा सकता है। भारतीय वैज्ञानिको ने इस पर गहन अध्ययन किया। गाजर घास की विरोधी वनस्पतियो को खोजने के लिये वे प्रकृति की प्रयोग शाला मे गये। फिर एक लम्बी सूची तैयार की। जिन प्रयोगो ने सारी दुनिया का ध्यान खीचा वे है डाँ एम. महादेवप्पा के प्रयोग। उन्होने अपना सारा जीवन गाजर घास पर शोध के लिये समर्पित कर दिया। उनकी सूची मे कैसिया सेरेसिया नामक वनस्पति सबसे ऊपर है। उन्होने अपने प्रयोगो को जमीनी स्तर पर दिखाकर यह प्रमाणित कर दिया कि इस वनस्पति की सघन वृद्धि गाजर घास का पूरी तरह से सफाया कर सकती है। उन्होने कर्नाटक के अलावा देश के विभिन्न हिस्सो मे इसका प्रदर्शन किया। उनके प्रयोगो से प्रभावित होकर कर्नाटक सरकार ने कैसिया सेरेसिया के टनो बीज किसानो को देने आरम्भ किये। आज भी यह क्रम जारी है। इस वनस्पति के पक्ष मे यह कहा जाता है कि यह आर्थिक महत्व की वनस्पति है और जमीन की उर्वरता को बढाती है।

 

जबलपुर के वैज्ञानिको ने गेन्दे की पहचान की। गेन्दे की आबादी के साथ गाजर घास को अलग-अलग अनुपात मे लगाया गया। फिर गहन शोध किया गया। छत्तीसगढ मे कैसिया की एक अन्य प्रजाति कैसिया टोरा को उपयोगी माना गया। कैसिया टोरा को स्थानीय स्तर पर चरोटा के नाम से जाना जाता है। लोग चरोटा की नयी पत्तियो को शाक की तरह उपयोग करते है। इसके बीजो का औद्योगिक महत्व है। प्रतिवर्ष टनो चरोटा बीजो की आपूर्ति देशी-विदेशी बाजारो मे की जाती है। गाजर घास के लिये इसे बेकार जमीन मे लगाने से आम लोगो को इससे आय भी होगी- ऐसा विशेषज्ञो का मानना है।

 

वनस्पतियो के माध्यम से गाजर घास के नियंत्रण की अपनी सीमाए है। एक वनस्पति एक स्थान पर तो सफल दिखती है पर दूसरे स्थान पर सफलता का प्रतिशत कम हो जाता है। इसीलिये कहा जाता है स्थानीय स्तर पर अनुसन्धान करके क्षेत्र विशेष के लिये स्थानीय वनस्पतियो की पहचान की जाये न कि दूसरे स्थान पर किये गये प्रयोगो को आँखे बन्द करके मान लिया जाये। दूसरी सीमा है इन वनस्पतियो का साल के कुछ महिनो मे ही सक्रिय रहना जबकि गाजर घास साल भर मजे से उगती रहती है। गाजर घास विदेशी पौधा है और इसे अकेले भारत लाया गया। अमेरिका मे इसे नष्ट करने वाले ढेरो कीडे और रोगकारक है पर भारत मे इसका कोई प्रकृतिजन्य दुश्मन नही है जबकि इसके विरुद्ध उपयोग की जाने वाली देशी वनस्पतियो को न केवल गाजर घास से लडना है बल्कि उनके अपने दुश्मन भी है। इसलिये लम्बे समय तक वे इससे मुकाबला नही कर पाती है।

 

बहुत से वैज्ञानिक यह प्रश्न खडा करते है कि जिन वनस्पतियो का हम सहारा ले रहे है कही वे ही बाद मे सरदर्द न बन जाये। यह भी एक तरह से एक समस्या को हटाने दूसरी समस्या का सहारा लेने वाली बात हुयी। फिर प्रकृति मे एक तरह की वनस्पति को बढावा देना प्रकृति के नियम के विरुद्ध है। ये तर्क भी सही जान पडते है। यह लगता है कि इन वनस्पतियो को किसानो और आम लोगो तक पहुँचाने मे हमने जल्दी दिखायी है। इस पर सभी पहलुओ पर विस्तार से अनुसन्धान करके ही आगे बढना ठीक रहेगा। आखिर हमारा एक गलत कदम आगामी कई पीढीयो के लिये मुसीबत बन सकता है।

 

एलिलोपैथी पर काम कर रहे बहुत से वैज्ञानिक दूसरे रुप मे इन वनस्पतियो के प्रयोग की बात करते है। उनका कहना है कि इन उपयोगी वनस्पतियो मे ऐसे रसायनो की पहचान की जाये जो कि गाजर घास के विपरीत काम करते है। फिर इन रसायनो का प्रयोग सीधे ही गाजर घास के नियंत्रण मे हो। इस पर अनुसन्धान हुये है पर बडी सफलता हाथ नही लगी है। आमतौर पर गाजर घास के बीजो पर इन रसायनो को डाल कर प्रयोगशाला मे निष्कर्ष निकाल लिये जाते है। फिर इन्ही निष्कर्षो को खेत मे भी आजमाया जाता है। खेत मे गाजर घास के बीजो के अलावा परिणाम को प्रभावित करने वाले ढेरो अन्य कारक भी रहते है। नतीजतन प्रयोग सफल नही हो पाते है।

 

गाजर घास का समंवित प्रबन्धन नही नियंत्रण जरुरी

 

आपने पढा कि गाजर घास नियंत्रण की सभी प्रचलित विधियो की अपनी-अपनी सीमाए है। सबके अपने गुण-दोष है। सभी विधियो के अच्छे गुणो को लेकर वैज्ञानिको ने समन्वित गाजर घास प्रबन्धन आरम्भ किया है। साधारण भाषा मे समझे तो ये विधिय़ाँ अलग-अलग औजार की तरह है जिन्हे अकेले या अन्य विधियो के साथ आवश्यकत्तानुसार अलग-अलग परिस्थितियो मे उपयोग किया जा सकता है। इस  समन्वित गाजर घास प्रबन्धन पर मैने ढेरो शोध-पत्र पढे है। आज भी ज्यादातर सम्बन्धित सम्मेलनो मे वरिष्ठ विशेषज्ञ इस पर केन्द्रित अपने शोध-पत्र पढते ही है। हाँ हर बार शीर्षक जरुर बदल जाता है। पर यह कटु सत्य है कि जिस तरह अलग-अलग विधियाँ गाजर घास को नियंत्रित करने मे असफल रही है वैसे ही समन्वित गाजर घास प्रबन्धन की भी स्थिति है। अभी तक विशेषज्ञो ने इसे अपनाकर किसी बडे क्षेत्र को गाजर घास मुक्त नही किया है। हाल ही मै जबलपुर गया था जहाँ इस पर गहन अध्ययन हो रहे है। अनुसन्धान केन्द्र के आस-पास ही बडी मात्रा मे गाजर घास का प्रकोप है। यह तो दिया तले अन्धेरे वाली बात हुयी। राष्ट्रीय खरपतवार अनुसन्धान संस्थान के लोगो (Logo) मे गाजर घास उपस्थित है। हमारे एक वैज्ञानिक मित्र इस पर टिप्पणी करते हुये कहते है कि लोगो मे इसकी उपस्थिति यह बता रही है कि यह कभी खत्म नही होने वाली। जिस दिन यह यहाँ से हट गयी उस दिन देश से भी हट जायेगी। भले ही वे इसे मजाक मे कहते हो पर इसके गहरे मायने है। आज भी बहुत से लोग हमारे बीच है जो नही चाहते कि गाजर घास खत्म हो और इससे होने वाली कमायी बन्द हो। वे चाहते है कि गाजर घास का खौफ बना रहे और इस नाम पर पैसे मिलते रहे। अन्यथा आप ही बताइये इतने बडे पैमाने पर इस पर इतने शोध हो रहे है, इतना पैसा खर्च किया जा रहा है पर आज भी हमारे पास एक भी ऐसा शहर आदर्श के रुप मे नही है जो गाजर घास मुक्त हो। इसके बचाव मे कई तर्क पस्तुत किये जा सकते है पर ऐसा ही चलता रहा तो आगे भी दशको तक कृषि अनुसन्धान के नाम पर आम जनता की मेहनत की कमायी को ऐसे ही बरबाद किया जाता रहेगा।

 

आम तौर पर समन्वित गाजर घास प्रबन्धन की बात कही जाती है पर मै इसे समन्वित गाजर घास नियंत्रण कहना पसन्द करता हूँ। इसका उद्देश्य सही मायने मे नियंत्रण ही होना चाहिये। यदि थोडी भी गाजर घास बची रह गयी तो उसे सम्स्या के रुप मे फिर से उठ खडे होने मे जरा भी देर नही लगेगी। प्रबन्धन के तहत गाजर घास को उस स्तर तक नष्ट किये जाने की बात होती है जिस स्तर पर वह नुकसान न पहुँचाये। नियंत्रण और उन्मूलन का अर्थ इसका समूल नाश है। नियंत्रण या उन्मूलन से बहुत से लोगो की पेट पर लात पडेगी इसलिये प्रबन्धन की बात की गयी है। ताकि समस्या बनी रहे और आय होती रहे। खैर यह बात भी सही है कि शब्दो के अधिक मायने नही है क्योकि ये अकादमिक स्तर पर ही रहते है। जमीनी स्तर पर कुछ नही होता है।

 

आज जब देश भर मे गाजर घास से प्रतिवर्ष करोडो की हानि हो रही है तब गाजर घास नियंत्रण के लिये एक दशक मनाने की जगह साल मे एक सप्ताह इसके लिये निश्चित कर दिया गया है। इस सप्ताह व्याख्यान होते है और फिर साल भर गाजर घास से पीठ कर बैठ जाते है। ऐसी नीतियाँ देश के लिये अभिशाप बनती जा रही है। बहुत बार मन मे यह विचार आता है कि क्यो न गाजर घास के समूल नाश के लिये शोधकर्ताओ को ठेका दे दिया जाये। यह ठेका समय सीमा मे हो और फिर सफलता मिलने पर उन्हे अलग से नियम बनाकर पुरुस्कारो से नवाजा जाये। इससे देश की कृषि की समस्याओ को सुलझाने शोधकर्ताओ मे स्वस्थ्य प्रतिस्पर्धा होगी और अकादमिक दावे करने वाले अलग से चिन्हित किये जा सकेंगे।

 

आज मै अपने लेखो के माध्यम से जो खुलकर लिख पाता हूँ उसके जवाब मे देश भर से हजारो पत्र आते है। हमारे देश मे बहुत से वैज्ञानिक है जो आगे आकर व्यवस्था की स्वस्थ्य आलोचना करना चाहते है पर मजबूरीवश कुछ नही बोल पाते है। उन्हे अपनी नौकरी का भय रह्ता है। वरिष्ठो द्वारा सताये जाने के भय से वे जीवन भर गलत नीतियो का समर्थन करते रहते है। इससे अंतोगत्वा देश को ही क्षति पहुँचती है। कृषि की योजना बनाने वालो की जवाबदेही भी तय होनी चाहिये। आखिर इन्ही की गलत योजनाओ के कारण तो आज हमारे देश मे खाद्यान्न संकट है। हमे अन्न के लिये विदेशो पर आश्रित होना पड रहा है। अन्नदाता आत्महत्या कर रहे है। स्वतंत्र रुप से काम करने के कारण और अपने शोध कार्यो के लिये दूसरो पर आश्रित नही होने के कारण आज मै खरी-खरी बाते कह पा रहा हूँ। मुझे असल संतोष तब ही मिलेगा जब योजनाकारो के कान मे जूँ रेंगना शुरु होगी और वे नीन्द से जागेंगे। 

 

क्यो न हो गाजर घास के उपयोग की बात

 

देश-विदेश मे मुठ्ठी भर लोग ऐसे भी है जो कि गाजर घास के सम्भावित उपयोग की बात कर रहे है। उनका कहना है कि गाजर घास का उपयोग निकल जाये तो यह अपने आप कम होने लगेगी। गाजर घास की तरह ही बहुत सी वनस्पतियाँ विदेशो से भारत लायी गयी जो बाद मे खरपतवार बन कर पूरे देश मे आम लोगो विशेषकर किसानो के लिये सिरदर्द बन गयी। बेशरम जिसका वैज्ञानिक नाम आइपोमिया कार्निया है, को हरी खाद बनाने के लिये विदेश से लाया गया था। बकायदा भारत से विशेषज्ञ गये और अपने विवेकानुसार निर्णय लेकर बिना भारतीय परिस्थितियो को जाने इसे ले आये। आज भी हमारे बीच वे किसान है जो बता सकते है कि कैसे बैड-बाजे के साथ ट्रक मे इसे लादकर उनके इलाको मे लाया गया था और बडा समारोह आयोजित किया गया था। आप उस समय को आज एक और विदेशी पौधे जैट्रोफा (रतनजोत) के स्वागत की तरह मान सकते है। आज देश के बहुत से बडे और प्रभावशाली लोग सिर्फ इसी की बात कर रहे है वैसे ही बेशरम के साथ हुआ उस समय।

 

 

किसानो को प्रेरित किया गया कि वे इसे अपनाये। कुछ किसानो ने अपनाया भी पर जब इस पौधे ने किसानो के खेतो मे ही कब्जा जमाना आरम्भ किया तो उन्होने बिना किसी देरी और डर इसे उखाड फेका। धीरे-धीरे पूरे देश मे किसानो ने यही प्रतिक्रिया दी और इस तरह पौधो को उखाड फेका। अब यह तथाकथित पौधा किसानो के लिये खरपतवार बन गया। इसे खरपतवार का दर्जा मिलने के बाद विशेषज्ञो ने इसे नष्ट करने शोध आरम्भ किये। शीघ्र ही रसायनो की लम्बी सूची तैयार हो गयी। किसानो ने इनके प्रयोग मे रुचि नही दिखायी। पर प्रयोग जारी रहे। इस बीच आम लोगो ने बेशरम के बहुत से उपयोग खोज निकाले।

 

 

आज इसके सभी पौध भागो से पशु चिकित्सा की औषधीयाँ बनायी जाती है। इसकी पत्तियो के रस के बाहरी प्रयोग से ल्यूकोडर्मा नामक रोग की चिकित्सा की जाती है। किसान इसकी सूखी शाखाओ को बाड के रुप मे उपयोग करते है। यद्यपि इसे जलाने पर इसका धुँआ नुकसान करता है पर फिर भी बहुत से लोग इसे जलाने के काम मे भी लाते है। खरपतवारो को उपयोगी मानने वाले बेशरम से अब जैविक खेती के लिये प्राकृतिक कीटनाशक बनाने मे लगे है।  देश मे मध्य भाग मे तो जानकार बेशरम को खाने वाले कीडो का उपयोग भी औषधी के लिये करते है। बेशरम के इतने उपयोग तो उन लोगो के पास भी नही है जहाँ का यह मूल निवासी है। आज वे आम भारतीय की प्रयोगधर्मिता से हैरान है। इन उपयोगो ने गाँवो के आस-पास बेशरम की आबादी पर नियंत्रण रखा हुआ है। जो गल्ती योजनाकारो ने की और फिर जो काम बहुत धन खर्च करके भी हमारे वैज्ञानिक नही कर पाये उसे आम जनता ने कर दिखाया। वैज्ञानिको ने एक काम अवश्य किया। जैसे-जैसे नये प्रयोग विकसित होते गये वे इसे अच्छी भाषा मे लिखकर उसमे तकनीकी शब्द जोडकर अपने नाम से प्रकाशित करवाते गये। पर सच तो सच ही रहेगा।

 

ऐसा ही उदाहरण लेंटाना नामक वनस्पति का है जिसे फूलो के कारण विदेशो से लाया गया और फिर बाद मे यह भारतीय जंगलो और पडत भूमि के लिये अभिशाप बन गया। वैज्ञानिको ने शोध किया पर आम लोगो ने इसके उपयोग विकसित करने मे रुचि दिखायी। आज लेंटाना की आबादी पर इन उपयोगो के कारण अंकुश लगा हुआ है। ऐसे दसो सफल उदाहरण है हमारे सामने तो फिर क्यो न गाजर घास के लिये भी यह योजना अपनायी जाये। यहाँ मै योजना को अपनाये जाने की बात कह रहा हूँ पर यह जानता हूँ कि कोई अपनाये या नही आम लोग गाजर घास के भी उपयोग ढूँढ निकालेंगे और इस दिशा मे उन्होने काम करना आरम्भ भी कर दिया है।    

 

गाजर घास से खाद: उपयोग की दिशा मे सशक्त कदम

 

आम तौर पर खेतो और मेडो पर उग रहे खरपतवारो को किसान उखाड देते है और फिर उन्हे खाद बनाने के लिये गढ्ढो मे डाल दिया जाता है। जब देश मे गाजर घास ने फैलना शुरु किया तो अन्य खरपतवारो की तरह किसानो ने इसे भी सडाना शुरु किया। इस पर वैज्ञानिक अनुसन्धान भी आरम्भ हुये। दक्षिण से एक रपट आयी कि गाजर घास का इस तरह प्रयोग सुरक्षित नही है क्योकि इसके घातक रसायन सडने की प्रक्रिया से अप्रभावित रहते है। यह भी कहा गया कि गाजर घास से बनी खाद फसल के लिये प्रयोग नही की जानी चाहिये विशेषकर खाद्यान्न फसलो के लिये। बाद मे वैज्ञानिको ने उन्नत विधियाँ विकसित की जिससे गाजर घास पूरी तरह सडने लगी। गाजर घास से अकेले और अन्य वनस्पतियो मुख्यतया खरपतवारो के साथ अलग-अलग अनुपात मे मिलाकर खाद बनाने की विधियो पर देश भर मे प्रयोग किये गये। शोध उपलब्धियो को विभिन्न मंचो से किसानो के बीच प्रस्तुत किया गया। गाजर घास पर आयोजित दूसरे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन मे बहुत से वैज्ञानिको ने अपने शोध परिणामो के साथ शिरकत की। उन्होने बडे उत्साह से अपनी बात रखी और यह भी कहा कि उनके प्रयोगो को अनुमोदित किया जाये ताकि किसानो को इससे छुटकारा और लाभ दोनो मिल सके। पर गाजर घास के रासायनिक नियंत्रण के पक्षधार लोगो ने उनके इस उत्साह को ठंडा कर दिया। बाद मे वे मुझसे इस विषय मे उनका साथ देने की बात कहते रहे पर मै भी इस हकीकत से वाकिफ था कि रसायन लाबी के सामने किसी की नही चलने वाली।

 

जब मै अपने व्याख्यानो के दौरान खाद वाले विषय पर आता हूँ तो किसान इसमे बडी रुचि लेते है। मै उनसे अपने विचार व्यक्त करने का अनुरोध करता हूँ ताकि इन विचारो को शोधकर्ताओ के पास पहुँचा सकूँ। गाजर घास से खाद बनाने का विरोध करने वाले यह कहते है कि खाद बनाने के लिये इसे उखाडना होगा। गाजर घास को उखाडना मतलब इससे प्रभावित होने के खुले खतरे। वे यह भी कहते है कि वैसे ही गाँव मे कृषि मजदूर कम हो रहे है। ऐसे मे गाजर घास को उखाडने का खर्च ही इतना अधिक हो जायेगा कि खाद महंग़ी लगने लगेगी। तीसरा तर्क होता है इस खाद की उपयोगिता के सम्बन्ध मे। आज देश भर मे रासायनिक खेती होती है। जैविक आदानो का प्रयोग कम होता है। ऐसे मे कितने किसान गाजर घास से बनी जैविक खाद का उपयोग करेंगे? खुले मन से इन तर्को को समझे तो ये सही लगते है। पर इन समस्याओ के समाधान भी है। कृषि अनुसन्धान मे यांत्रिकी विभाग का अहम योगदान है। उनकी सहायता से ऐसे यन्त्र बनाये जा सकते है जो कि बेकार जमीन से गाजर घास उखाडकर एक स्थान पर इस प्रकार एकत्र कर दे कि किसी भी प्रकार से वे मनुष्य़ॉ के सम्पर्क मे न आये। फिर इन्हे विशेष तौर पर बनाये गये गढ्ढो मे डाल दे सडाने के लिये। इससे मानव श्रम की बचत होगी और साथ मे एलर्जी का खतरा भी नही रहेगा। इसी तरह खेतो से गाजर घास को उखाडने के लिये भी सस्ते पर प्रभावी यंत्र बनाये जा सकते है। रही बात रासायनिक खाद के बढते प्रचलन की तो सार्वजनिक बाग-बगीचो से लेकर निजी वाटिका मे यदि उपलब्धता और जागरुकता हो तो आम लोग जैविक खाद का ही प्रयोग करते है। योजनाकार चाहे तो बेरोजगार युवको का दल बनाया जा सकता है जो बेकार जमीन से यंत्रो की सहायता से गाजर घास एकत्रित करे और फिर उससे खाद बनाये। फिर इस खाद को बेचकर लाभ अर्जन करे। यदि सही ढंग से इसके विषय मे प्रचार प्रसार किया जायेगा तो निश्चित ही आम लोग सामने आयेंगे इसे खरीदने। गाँवो से प्रतिदिन पलायन कर रहे युवा इस तरह के कार्यो को अपनाकर न केवल जीविकोपार्जन कर सकते है बल्कि गाँवो को इस अभिशाप से मुक्ति भी दिलवा सकते है।

 

एक बात और। गाजर घास के पौधो को खाद बनाने के लिये पुष्पन से पहले ही एकत्र करना होता है। बीज युक्त पौधे यदि उपयोग किये जाते है तो न केवल सडाने मे दिक्कत पेश आती है बल्कि खाद मे बीज भी पहुँच जाते है। इस तरह से जरा सी लापरवाही से खाद के माध्यम से गाजर घास फैलने लगती है। यदि बडे पैमाने पर खाद बनाने की योजना बनायी जाती है तो इस पर विशेष ध्यान देना होगा।

 

गाजर घास का औषधीय उपयोग: एक अनछुआ पहलू

 

प्राचीन भारतीय ग्रंथो मे यह लिखा है कि इस धरती मे पायी जाने वाली कोई भी वनस्पति बेकार नही है। यह मनुष्य की अज्ञानता है जो उसने कुछ वनस्पतियो को उपयोगी मान लिया है और शेष को बेकार की श्रेणी मे डाल दिया है। दुनिया के उन भागो जहाँ गाजर घास की उत्पत्ति हुयी है, मे आज भी मूल निवासी गाजर घास का प्रयोग बतौर औषधी करते है। दुनिया भर मे इसके औषधीय उपयोगो को संकलित कर मैने कई हिन्दी लेख लिखे फिर वैज्ञानिक समुदाय तक बात पहुँचाने के लिये एक शोध-पत्र भी प्रकाशित किया। बहुत लोगो को गाजर घास के औषधीय उपयोग जानकर हैरानी हुयी। आमतौर जब हम किसी पौधे के हानिकारक गुणो को जान जाते है तो फिर इसके अच्छे गुणो को अनदेखा कर बस उससे पूरी तरह नफरत करने लगते है। पर जैसा कि हमारे प्राचीन ग्रंथ कहते है सभी वनस्पतियो मे मानव की उपयोगिता के लिये कुछ न कुछ तो है। आप धतूरे का ही उदाहरण ले। इसके बीजो का चूर्ण थोडी मात्रा मे ही आपकी जान ले सकता है। इसे अत्यंत जहरीले पौधे की श्रेणी मे रखा जाता है। पर जानकार इसी जहरीलेपन का लाभ उठाकर इससे औषधी तैयार लरते है और कैसर जैसे आधुनिक रोगो की चिकित्सा करते है। इसी जहरीलेपन का लाभे उठाकर इसके विभिन्न भागो का प्रयोग जैविक कृषि मे किया जाता है।

 

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति मे जिस पार्थेनियम नामक दवा का उल्लेख मिलता है वह गाजर घास से ही बनायी जाती है। आज दुनिया भर मे इस दवा का प्रयोग हो रहा है और जाने-अनजाने लोग गाजर घास के औषधीय गुणो से लाभांवित हो रहे है। गाजर घास से बनने वाली यह दवा विदेशो से आती है। मैने अपने लेखो के माध्यम से बहुत बार भारतीय होम्योपैथी विशेषज्ञो से यह अनुरोध किया है कि वे भारत मे उग रही गाजर घास से यह दवा बनाये और देखे कि यह बाहरी दवा से कितनी अधिक उपयोगी है। यदि यह अधिक उपयोगी निकली तो फिर तो गाजर घास के उपयोग की दिशा मे एक और राह निकल पडेग़ी।

 

मै होम्योपैथी दवाओ के कृषि मे प्रयोग की सम्भावना पर कार्य कर रहा हूँ। विज्ञान की इस नयी शाखा को एग्रोहोम्योपैथी (Agrohomoeopathy) कहा जाता है। दुनिया भर मे गिने-चुने लोग ही इस पर काम कर रहे है। मैने अपने प्रयोगो मे जिन होम्योपैथिक दवाओ को अपनाया उनमे पार्थेनियम भी शामिल है। कई फसलो मे इसके अच्छे परिणाम देखने को मिले। मेरा मानना है कि यदि मेरे प्रयोग सफल होते है तो बडी मात्रा मे गाजर घास की आवश्यकता होगी होम्योपैथी दवा बनाने के लिये। इससे हम गाजर घास का उपयोग कर इसकी आबादी को समाप्त कर सकेंगे।

 

कुछ वर्षो पहले मै वनौषधीयो का व्यापार करने वाले लोगो के बीच घूम रहा था छत्तीसग़ढ मे। जैसा आप जानते ही है छत्तीसगढ से प्रतिवर्ष टनो वनौषधीयो की आपूर्ति देश-विदेश मे की जाती है। व्यापारियो से बात करते हुये अचानक ही मुझे पता चला कि कलकत्ता की किसी फर्म ने दस टन गाजर घास की सूखी जडो की माँग की थी। यह चौकाने वाली बात थी। बाद मे पता चला कि इससे औषधी बनाने के लिये फर्म द्वारा कई गोपनीय प्रयोग किये जा रहे है। भले ही ये प्रयोग गोपनीय हो पर यह खुशी की बात है कि गाजर घास की उपयोगिता पर सभी स्तर पर प्रयास हो रहे है।

 

दशको से गाजरघास के साथ रहते हुये देश के मध्य भाग के पारम्परिक चिकित्सको ने भी इसके कुछ औषधीय उपयोग खोज निकाले है। वे गाजर घास का प्रयोग दैनिक जीवन मे कर रहे है। मैने अपने मधुमेह की वैज्ञानिक रपट मे विस्तार से लिखा है कि कैसे गाजर घास के पौध भागो का प्रयोग अन्य वनस्पतियो के गुणो मे वृद्धि के लिये ये पारम्परिक चिकित्सक करते है।

 

गाजर घास मे औषधीय गुण है-यह नया जोश भरने वाली बात हो सकती है आपके लिये पर हमे यह भी नही भूलना चाहिये कि इससे तरह-तरह की एलर्जी और रोग होते है। यह मनुष्य़ॉ के अलावा हमारे पशुओ और वन्य जीवो के लिये भी अभिशाप है। वनो मे इसका फैलाव देशी जडी-बूटियो के अस्तित्व को समाप्त कर रहा है। गाजर घास से औषधी बनाने के प्रयोग केवल इसलिये किये जा रहे है कि इससे गाजर घास समाप्त हो जायेगी। इसका यह कतई मतलब नही है कि गाजर घास को उखाडना हम बन्द कर दे या इसकी खेती आरम्भ कर दी जाये। सभी प्रयोग आरम्भिक स्तर पर है।

 

मुझे ढेरो पत्र आते है दुनिया भर से कि हम गाजर घास का औषधीय उपयोग करना चाहते है। मै उनसे भी यही अनुरोध करता हूँ कि यह जानकारो के बस की बात है। आम लोगो को प्रयोगो के पूर्ण होने की प्रतीक्षा करनी चाहिये। अति उत्साह घातक भी हो सकता है।   

 

और भी उपयोग है गाजर घास के

 

गाजर घास के विभिन्न भागो के प्रयोग से कीटनाशक बनाने के काफी प्रयास हुये है। प्रयोगशाला से खेत स्तर तक ऐसे ढेरो प्रयोगो की जानकारी सन्दर्भ साहित्यो मे मिलती है। अभी भी इस दिशा मे प्रयास चल रहे है। ज्यादातर वैज्ञानिक यह मानते है कि गाजर घास से तैयार सत्व कमजोर कीटनाशक है। इसलिये नीम जैसे सशक्त विकल्प होने के कारण इसकी उपयोगिता नही के बराबर है।

 

 

भारतीय किसानो ने जब औषधीय और सगन्ध फसलो की जैविक खेती व्यापक स्तर पर शुरु की तो उनके सामने जैविक आदानो की कमी एक बडी समस्या थी। देश भर मे किसानो से गोमूत्र और गोबर पर आधारित पारम्परिक आदानो को इस्तमाल करना आरम्भ किया गया। उसमे कई प्रकार की वनस्पतियाँ भी मिलायी गयी। नीम पर ज्यादा प्रयोग हुये। पर सफेद मूसली जैसे फसल मे जब नीम आधारित कीटनाशको के दुष्प्रभाव दिखने लगे तो आस-पास उपलब्ध खरपतवारो पर ध्यान गया। इसी क्रम मे गाजर घास पर भी लोगो की नजर पडी। मैने किसानो के साथ मिलकर 30 से अधिक प्रकार की औषधीय और सगन्ध फसलो के लिये नाना प्रकार के मिश्रण तैयार किये फिर बडे स्तर पर खेतो मे इनका प्रयोग किया। कस्तूरी भिण्डी नामक औषधीय फसल कीडो की खान है। ये कीडे उपलब्ध कीटनाशको से मर जाते है पर कीटनाशको का प्रयोग इसके बीजो की सुगन्ध को कम कर देता है। बीजो मे कम सुगन्ध मतलब कम मूल्य की प्राप्ति। साधारण जैविक कीटनाशक जब असफल होने लगे तो बीस प्रकार की वनस्पतियो को मिलाकर हम लोगो से एक मिश्रण तैयार किया। इन बीस वनस्पतियो मे गाजर घास भी एक थी। इस मिश्रण मे गाजर घास की एक विशेष भूमिका थी। इसके बहुत अच्छे परिणाम मिले। आज भी किसान इसका प्रयोग कर रहे है। सब्जियो की फसल मे भी इसका प्रयोग किया जा रहा है। इस मिश्रण के प्रयोग से जहाँ एक ओर आस-पास के खरपतवारो की सफाई हो जा रही है वही कीटनाशको पर होने वाल खर्च भी बच जा रहा है। किसान यह जानते है कि बहुत जल्दी कीट इन्हे सहन करने लग जाते है इसलिये वे नित नये प्रयोग कर इस मिश्रण को और अधिक शक्तिशाली बनाते जाते है। 

 

देश के पौध रोग विशेषज्ञो ने भी गाजर घास के प्रयोग से रोगाणुओ पर नियंत्रण की कोशिश की। औषधीय फसलो मे हमने गाजर घास की सहायता से बहुत से कवक जनित रोगो से फसलो को बचाया। हमने पाया कि पानी के पास उग रही गाजर घास मे अधिक रोगनाशक गुण होते है। आज ज्यादातर प्रयोगशाला स्तर पर इस तरह के प्रयोग हो रहे है। आर्थिक सहायता नही मिलने के कारण इस पर आगे काम नही हो पाता है। इसी कारण नये शोधार्थी भी ऐसे नयी विषयो से दूर भागते है।

 

प्रयोगशाला मे किये गये बहुत से प्रयोगो मे वैज्ञानिको को गाजर घास के विभिन्न पौध भागो के कई फसलो पर सकारात्मक प्रभाव भी मिले है। पर चूँकि इसे इतना बदनाम कर दिया गया है कि वैज्ञानिक इस तरह के चौकाने वाले प्रयोगो को सामने लाने मे झिझकते है। गाजर घास के सकारात्मक प्रभाव वाले शोध आलेख बडी मुश्किल से पत्रिकाओ मे छप पाते है। टेढे-मेढे प्रश्न किये जाते है और वैज्ञानिक बिरादरी इस तरह की नयी खोज को संश्य से देखती है। विज्ञान सम्मेलनो मे भी खरपतवार के उपयोगो पर अलग से समय नही रखा जाता है। यदि खरपतवारो विशेषकर गाजर घास जैसे खरपतवारो के उपयोगो पर शोध को बढावा दिया जाये बहुत से उन वैज्ञानिको को प्रोत्साहन मिलेगा जिन्होने इसके लिये अपना जीवन समर्पित कर दिया।

 

गाजर घास जागरुकता अभियान और बच्चे

 

आज सभी वर्ग के लोगो को गाजर घास के खतरो के विषय मे बताना जरुरी है पर मैने अपने अनुभव से यह जाना है कि बच्चो तक यह बात पहुँचाना जरुरी है। क्योकि यह कहा गया है कि यदि आपने बच्चो को सचेत कर दिया मतलब एक पूरी पीढी को सचेत कर दिया। अपने गाजर घास जागरुकता के दौरान मै देश भर के हजारो स्कूलो मे गया और सरल भाषा मे इसके विषय मे बताया। उन्हे गाजर घास की पहचान करायी और फिर इससे होने वाले नुकसानो के विषय मे बताया। जिन स्कूलो मे स्लाइड प्रोजेक्टर उपलब्ध था वहाँ रोचक स्लाइडस दिखायी। इससे बच्चे और अधिक रुचि लेते थे। बाद मे मैने गाजर घास पर एक छोटी से फिल्म भी बनायी। मै उन स्कूलो मे भी गया जहाँ बिना बिजली व्याख्यान देना पडा। फिर भी बच्चो का उत्साह देखते ही बनता था। बीस मिनट के व्याख्यान मे कम से कम 5 बार बच्चो को हँसी आनी चाहिये ताकि उनका मन लगा रहा। फिर उनसे चर्चा कर यह सुनिश्चित करना भी जरुरी होता कि सही जानकारी उन तक पहुँची या नही।

 

 

बालमन बहुत कल्पनाशील होता है। ज्यादातर बच्चे व्याख्यान सुनते-सुनते ही गाजर घास की परिकल्पना करने लगते है और यदि उनकी झिझक दूर रहे तो व्याख्यान के समाप्त होते ही उनके प्रश्न आ जाते है। यह सब सालो से चल रहा है। बहुत सारे बच्चे अब शिक्षा समाप्त कर बडे ओहदो पर है। अभी भी समाचार आते रहते है किसी जिलाधिकारी ने गाजर घास चलाया या किसी ने इस पर लिखा। मुझे लगता है जैसे आधा काम पूरा हो गया।  

 

कई स्थानो पर अतिउत्साह मे मास्टर जी मेरे आने से पहले फावडा आदि लेकर बच्चो को तैयार रहने को कहते है ताकि गाजर घास उखाडी जा सके। मै उखाडने वाले अभियान मे बच्चो के शामिल होने के खिलाफ हूँ। इन्हे एलर्जी का खतरा बहुत अधिक होता है। नाक-कान बाँध लेने के बाद भी। पिछले कुछ वर्षो से देश भर मे गाजर घास जागरण सप्ताह या पखवाडा मनाया जाता है। इस समय विभिन्न टीवी चैनलो मे बच्चो  को बढ-चढ कर हिस्सा लेते दिखाया जाता है। मुझे यह बडा ही अटपटा लगता है। मै अपने लेखो के माध्यम से इस पर लगातार लिखता रहा हूँ। ऐसे अभियान मे डाक्टर का होना जरुरी है- मै पहले ही इस बारे मे लिख चुका हूँ।

 

मुझे मध्यप्रदेश विज्ञान सभा के उत्साही कार्यकर्ताओ की याद आ रही है। उन्होने बहुत दिनो तक मुझे बच्चो के सामने व्याख्यान देने आमंत्रित किया। कभी पेंटिंग प्रतियोगिया करवायी तो कभी वाद-विवाद। एक बार तो आरंग के पास महानदी के तट पर एक कार्यशाला का आयोजन हुआ। इसमे मैने गाजर घास पर व्याख्यान दिया फिर बच्चो ने मिलकर एक कठपुतली नाटक रचा इस पर। गजब का अनुभव रहा यह जीवन का।

 

स्कूलो मे व्याख्यान ने कवि ह्र्दय वाले बच्चो को खूब प्रेरित किया। बच्चो ने ढेरो कविताए लिखी। एक बार महासमुन्द यात्रा के दौरान मैने गाजर घास पर एक छत्तीसगढी गीत भी सुना। आप माने या न माने पर बच्चो मे प्रकृति प्रदत्त वैज्ञानिक छुपा होता है। हमारी शिक्षा प्रणाली इस वैज्ञानिक को समाप्त कर देती है पर फिर भी बहुत से बच्चो मे गजब का माद्दा होता है नयी समस्याओ को सुलझाने का।  यही कारण है कि आप हर एक-दो महिने मे पढेंगे कि अमुक छात्र ने गाजर घास को नष्ट करने के उपाय विकसित किये। ज्यादातर मामलो मे वैज्ञानिक बिरादरी से उन्हे प्रोत्साहन नही मिल पाता। उनसे बडे-बडे प्रश्न किये जाते है फिर उनसे पढाई पूरी करने की बात कही जाती है पर मेरा मानना है कि बच्चो ने इस उम्र मे इस पर सोचा यही हमारे लिये बहुत बडी उपलब्धि है।

 

गाजर घास पर व्याख्यानो का एक असर यह भी हुआ कि बच्चो ने विज्ञान मेलो के लिये इस पर प्रोजेक्ट बनाना आरम्भ किया। रायपुर के बच्चो द्वारा इसके विभिन्न आयामो पर तैयार प्रोजेक्ट वर्षो तक राष्ट्रीय स्तर पर पुरुस्कृत होता रहा। बच्चे मन लगाकर शोध भी करते थे। वे किसानो से लेकर आम आदमियो से मिलकर पहले यह विश्लेषण करते कि गाजर घास के प्रति कैसी जागरुकता है। फिर कम जागरुकता वाले  क्षेत्रो मे जागरुकता अभियान चलाते। आखिर मे एक रपट बनाकर अलग-अलग स्तरो तक इसे पहुँचाते। राष्ट्रीय स्तर पर निर्णायक ऐसे प्रयासो की जमकर तारीफ करते थे। बच्चो का हरे कैसर पर प्रोजेक्ट देश भर मे लोकप्रिय हो गया। इससे अन्य शहरो के बच्चे भी जान पाये कि गाजर घास क्या है? ऐसे सतत प्रयासो की जरुरत है। 

 

घातक गाजर घास से अंजान बच्चे  

 

कुछ वर्षो पहले मै रायपुर के आस-पास खरपतवारो की तस्वीरे उतार रहा था। यहाँ बडे क्षेत्र मे गाजरघास भी फैली हुयी थी। कुछ बच्चो को वहाँ पाकर मै उस ओर बढा। बच्चे न केवल गाजर घास के पास खेल रहे थे बल्कि गाजर घास से खेल रहे थे। उन्होने इसके  एलर्जी फैलाने वाले फूलो को कान मे आभूषण की तरह पहन रखा था। यह निश्चित ही चौकाने और दुखी कर देने वाला दृश्य था। उन्हे गाजर घास के दुष्प्रभावो के विषय मे नही मालूम था। मैने उन्हे जानकारी दी और इससे दूर रहने को कहा। जागरुकता के अभाव मे गाँव के बच्चे और बहुत बार शहरी बच्चे भी गाजर घास के पास पहुँच जाते है और अनजाने मे ही नयी बीमारी के शिकार हो जाते है।

 

जागरुकता का अभाव सार्वजनिक उद्यानो का रख-रखाव करने वाले लोगो मे भी है। देश भर के बहुत से नामी-गिरामी उद्यानो मे मैने इसे उगते देखा है और इसे उखाडा है। उद्यानो तक इसके बीज बेकार जमीन से लायी गयी खाद के साथ पहुँच जाते है। फिर फैलते ही जाते है। छत्तीसगढ मे तो अखबार इस दिशा मे जागरुकता लाने लम्बे समय तक काम करते रहे। वे समय-समय पर उद्यानो मे गाजर घास की तस्वीरे छापते रहे और रख-रखाव करने वालो को कोसते रहे। प्रेस के डर से ही सही पर इसका असर हुआ। अब अखबार इसे पुराने पड गये विषय पर कम छापते है। नतीजन गाजर घास को उद्यानो मे देखा जा सकता है।

 

अपने भतीजे के जन्मदिवस पर मै उसके एक साथी से मिला जो धूम-धडाके से दूर उदास बैठा हुआ था। उसके हाथ मे इन्हेलर था और उसकी साँस बहुत तेज थी। उसने बताया कि उसे एलर्जी है परागकणो से। इसके लिये वह तेज दवाए लेता है जिससे ठीक से काम नही कर पाता है। दूसरे दिन मै भतीजे के साथ उस मित्र के घर गया। जैसी कि उम्मीद थी आस-पास गाजर घास उगी हुयी थी। यह जानकर आश्चर्य हुआ कि उसके माता-पिता इससे वाकिफ थे और उन्होने इस खरपतवार के विषय मे नयी-नयी जानकारियाँ दी। पर घर से बाहर निकलकर इसे उखाडा नही। हम लोगो ने नमक के घोल से इसे नष्ट किया और वापस आ गये। कुछ ही दिनो मे मित्र की बीमारी ठीक होने लगी। अबकी बार जन्म दिवस पर उसके साथ डाँस करने की बाट जोह रहा हूँ मै।

 

बहुत से बच्चे ऐसे भी मिले जिन्हे एलर्जी होने पर बाहर घूम कर आने की डाक्टरी सलाह मिलती है। सम्पन्न पालक बच्चो को स्विटजरलैड तक घुमा लाते है। पर वापस आकर समस्या वैसी की वैसी हो जाती है। बहुत सी वनस्पतियो से परगाकण साल के कुछ विशेष महिनो मे ही निकलते है पर गाजर घास साल भर उगती है इसलिये इसे नष्ट करने के अलावा कोई दूसरा चारा नही है। गाजर घास को उगने देने और बच्चो को महंगी दवा खिलाते जाने मे कोई समझदारी नही है। छत्तीसगढ की औद्योगिक नगरी भिलाई मे गाजर घास से प्रभावित बहुत से बच्चे है। यहाँ हर बार गाजर घास को नष्ट करने के लिये करोडो खर्चे जाते है। बडे-बडे आयोजन किये जाते है पर फिर भी गाजर घास खत्म नही होती है। यहाँ गाजर घास के लिये ठेका दिया जाता है। ठेकेदार गाजर घास के फूलने का इंतजार करते है। फिर तलवारनुमा औजार से गाजर घास को काट देते है। बीज गिर जाते है जमीन मे अगले मौसम के लिये। इस तरह वे अपने अगले ठेके की तैयारी कर लेते है। समस्या बनी रहती है और उन्हे काम मिलता रहता है।

 

कालेज की शिक्षा के दौरान बंगाल के मोहनपुर जाना हुआ। वहाँ गाजर घास का जबरदस्त प्रकोप है। दुर्गा पूजा के दौरान तो इससे प्रभावित रोगियो की संख्या मे अप्रत्याशित वृद्धि हो जाती है। हमे बताया गया कि डाक्टरो को सतर्क कर दिया जाता है और सम्बन्धित दवाईयाँ मंगा ली जाती है। पता नही अब वहाँ कैसे हालात है?

 

रायपुर के एक चिकित्सक है डाँ. अग्रवाल। उन्हे मेरे अभियान के विषय मे जानकारी है। मैने उन्हे अपनी पुस्तक भी भेट की है। उनके पास जब कभी भी गाजर घास से प्रभावित मरीज विशेषकर बच्चे आते है तो पहले वे उन्हे मुझसे मिलने का परामर्श देते है। मुझसे उपाय जानने के बाद मरीज उनके पास जाते है और फिर डाक्टर साहब चिकित्सा करते है। मै उनका आभारी हूँ जो इस तरह से वे रोगियो को जागरुक करते है। मैने कई बार रोगियो के साथ जाकर गाजर घास को नष्ट किया है। जब उन्होने फीस देनी चाही तो उनसे यही कहा कि कम से कम दस लोगो को नि:शुल्क सलाह दीजियेगा, फिर मेरी फीस अपने आप वसूल हो जायेगी।

 

दस हजार लोगो को पत्र से गाजर घास के विषय मे जानकारी

 

हर बार जब भी देश-विदेश के विशेषज्ञ गाजर घास पर चर्चा के लिये एकत्र होते है तो गाजर घास की समस्या को हल करने की कार्ययोजना प्रस्तुत करते है। इसमे बहुत अधिक धन की माँग की जाती है। इसके विषय मे जागरुकता फैलाने के लिये भी महंगी कार्ययोजना प्रस्तुत की जाती है। नतीजतन योजनाकार इस पर विचार ही नही करते है और कार्ययोजनाओ को ठंडे बस्ते मे डाल दिया जाता है। इस तरह कितनी ही बैठके हो चुकी है और न जाने कितनी भविष्य़ मे होंगी। इस तरह की बैठको से मै बचता हूँ। कभी-कभी यह लगता है कि ऐसी बैठके यदि इंटरनेट के माध्यम से हो जाये तो देश का बहुत पैसा बचेगा और साथ ही उस पैसे से कई क्षेत्रो को गाजर घास मुक्त किया जा सकेगा। ऐसा लिखने पर बहुत से वैज्ञानिक आपत्ति करते है और कहते है इसीलिये आपको बहुत सी बैठको मे नही बुलाया जाता है। यदि आपको हवाई यात्रा करनी है और दिल्ली घूमना है तो ऐसे लेख लिखना बन्द करे।

 

सस्ते मे गाजर घास के विषय मे जागरुकता लानी है तो मै बहुत बडा मददगार साबित हो सकता हूँ। चूँकि बिना किसी आर्थिक सहायता से मै इस अभियान मे जुटा हुआ हूँ इसलिये सस्ते मे कैसे हमारा सन्देश आम लोगो तक पहुँचे इसके लिये लगातार दिमाग चलाना पडता है। मै लम्बे समय से कृषि पत्र-पत्रिकाओ मे लिखता रहा हूँ। किसानो तक बात पहुँचाने के लिये मैने इसी माध्यम को चुना। मैने एक छोटा से विज्ञापन बनाया जिसमे कहा गया था कि मनुष्यो, फसलो और पशुओ को हानि पहुँचाने वाले घातक खरपतवार गाजर घास के विषय मे नि:शुल्क जानकारी के लिये नीचे दिये पते पर लिखे। शुरु मे तो कृषि पत्रिकाओ ने इस विज्ञापन को मुफ्त मे प्रकाशित कर अपना बडप्पन दिखाया फिर धीरे-धीरे वे दाम माँगने लगे। इससे जेब पर असर पडा। परिणामस्वरुप विज्ञापन दो-तीन पत्रिकाओ तका सीमित रह गया।

 

इस विज्ञापन का असर अच्छा हुआ। मुझे कुछ ही सालो मे पन्द्रह हजार से अधिक पत्र मिले। इन पत्रो को पढने से यह साफ दिखता था कि कैसे इस विदेशी खरपतवार ने पूरे देश मे कहर बरपा रखा है। बहुत से रोगियो के भी पत्र आये। मैने एक पर्चा तैयार कर रखा था जिसमे प्रश्नोत्तरी के रुप मे गाजर घास के बारे मे जानकारी थी। इसकी बहुत सारी फोटोकापी करवा ली थी। हर पत्र के जवाब मे एक पर्चा और एक रंगीन चित्र भेजा जाने लगा। इसमे व्यय तो था पर सब कुछ तीन रुपयो मे निपट जाता था। फिर संकट के दिन आये। मैने दस हजार पत्रो के जवाब दिये ही थे कि डाक दर बढ गयी। अब दो रुपये की जगह पाँच रुपये लगने लगे थे। मैने पत्रो का जवाब देना बन्द कर दिया। विज्ञापन का प्रकाशन भी बन्द कर दिया। पत्रो के आने का क्रम जारी रहा और आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि पुराने विज्ञापनो के आधार पर आज भी बहुत से पत्र आते है। बीच मे विज्ञापन मे थोडा फेरबदल किया और लोगो से पत्र की जगह निश्चित समय मे फोन करने को कहा। पर दिन भर वक्त-बेवक्त फोन आने लगे। धीरे-धीरे यह भी बन्द हो गया।

 

मुफ्त मे पर्चा और रंगीन चित्र पाने पर लोगो की प्रतिक्रियाए अलग-अलग रही। ज्यादातर लोगो ने धन्यवाद देने के लिये फिर से पत्र लिखा। कुछ ने इस पर्चे पर छपी जानकारी को अपने नाम से प्रकाशित करवाया फिर मुझे प्रति भी भेजी। मैने यह सोचकर मन को मनाया कि चलो इसी बहाने गाजर घास का प्रचार तो हो रहा है। बहुतो ने आक्रोश मे लिखा कि इतनी जानकारी तो उनके पास पहले से थी। और जानकारी चाहिये वो भी नि:शुल्क। कुल मिलाकर यह अच्छा अनुभव रहा। यदि आर्थिक पक्ष सही होता तो इस अभियान को जारी रखा जा सकता था। मै जानता हूँ कि करोडो के इस देश मे दस हजार लोगो तक यह जानकारी पहुँचाना बहुत छोटा प्रयास है पर मै इतना कर पाया इसके लिये ऊपर वाले का आभारी हूँ।   

 

सिनेमा घरो से लेकर पत्रिकाओ तक गाजर घास

 

सिनेमा घरो मे इंटरवेल के समय कई प्रकार की स्लाइड दिखायी जाती है। किसी ने सुझाव दिया कि गाजर घास की स्लाइड भी दिखायी जाये। आनन-फानन मे कई स्लाइड बनवायी गयी और रायपुर शहर के सिनेमा घरो से सम्पर्क किया। सबने विज्ञापन के दाम माँगे। दाम ऊँचे थे इसलिये छोटे शहरो के सिनेमा घरो का रुख किया। धमतरी मे बात जमी और प्रशांत टाकीज़ के नाहटा जी ने बडप्पन दिखाया। वे लम्बे समय तक इसे दिखाते रहे बिना शुल्क लिये। इंटरवेल के समय लोग बाहर चले जाते है और बहुत कम लोग ही इसे देख पाते है-ऐसा मन मे था। पर जब इस स्लाइड को देखकर ढेरो पत्र आने लगे तो इसका प्रभाव समझ मे आया।

 

पर्चे मे लिखी जानकारी को संक्षिप्त मानते हुये जब मैने गाजर घास पर एक पुस्तक लिखी हिन्दी मे तो यह उम्मीद थी कि यह हाथो-हाथ बिक जायेगी। धन की कमी से यह आकर्षक नही बन पायी पर इसमे जानकारी विस्तार से थी। देश भर के अखबारो मे इसकी समीक्षा छपी और कुछ लोगो ने इसे मंगाया भी। पर मैने यह पाया कि नि:शुल्क जानकारी के लिये सब तैयार है पर इसके लिये पैसे खर्चने को कम लोग राजी है। परिणामस्वरुप आज भी सैकडो पुस्तके वैसी की वैसी पडी है। विभिन्न प्रतियोगिताओ मे पुरुस्कार स्वरुप मै इसे भेट कर देता हूँ। गाजर घास अभियान के दौरान लोगो ने सलाह दी कि आप एक स्टाल लगाकर इसे बेचे। मैने ऐसा बहुत से धार्मिक आयोजनो विशेषकर टीवी वाले बाबाओ की सभाओ के बाहर देखा है। पता नही क्यो यह मुझे नही जँचता। मै अपने व्याख्यान मे बता देता हूँ इस पुस्तक के बारे मे। जिसे लेना होता है वह सम्पर्क कर लेता है। चन्द रुपयो की इस पुस्तक मे छूट माँगने वालो की भी कमी नही है। पुस्तक प्रकाशन और उसे बेचना भारतीय लेखको के लिये सदा ही सिरदर्द रहा है। कैसे उनका शोषण होता है- हम सब जानते है। यदि इस बेडी को तोड दे तो भारत अपने लेखन और साहित्य के बल पर ही विश्व फतह कर सकता है।

 

दीवारो पर गाजर घास के विषय मे जानकारी लिखवाना भी उपयोगी लगा। एक विज्ञापन एजेंसी की मदद ली और रायपुर शहर मे दीवारो पर जानकारी लिखवा दी गयी। मुझे यह बताया गया कि यह अघोषित नियम है कि पन्द्रह दिनो तक इसे नही मिटाया जायेगा। फिर कोई दूसरा इस पर अपना विज्ञापन लगा देगा। सो कुछ दिनो की चाँदनी रही पर आम लोगो के फोन आते रहे। इससे लगा कि यह भी प्रभावी कदम है। इस बीच गुरुजनो ने राय दी कि लोगो के मन मे गाजर घास नाम बस जाना चाहिये फिर वे अपने आप इसके विषय मे जानकारी खोज निकालेंगे। मैने एक नया उपाय अपनाया।

 

मैने निश्चय किया कि हर एक दिन की आड पर गाजर घास के विभिन्न पहलुओ पर एक हिन्दी लेख लिखूंगा। एक ही पौधे पर इतना लिखना और वो भी विविधता के साथ- असम्भव लगा पर शीघ्र ही मै इसमे दक्ष हो गया। धीरे-धीरे रोज एक लेख लिखने लगा। कभी-कभी दो-तीन लेख एक दिन मे हो जाते थे। अब समस्या हुयी इनके प्रकाशन की। इतने सारे लेख देखकर कृषि पत्रिकाए खुश हुयी पर उनके पास तो पहले ही से लेखो का अम्बार था। उत्तर भारत की एक साप्ताहिक पत्रिका के सम्पादक ने तो लिख दिया कि आप हमे आगे दस वर्षो तक लेख न भेजे। मतलब उनके पास इतने सारे लेख पहले ही थे मेरे। फिर एक ही विषय पर लगातार लेख छापने के लिये प्रकाशक तैयार नही थे। बहुत सी फीचर्स एजेंसियो ने रुचि दिखायी और इनके पैसे नही देने की शर्त पर इसे देश भर मे प्रकाशित करवाया। लगातार लिखने का असर अच्छा खासा हुआ। एक व्याख्यान के अंत मे एक सज्जन पास आकर बोले कि आपको देखता हूँ तो गाजर घास की याद आ जाती है और गाजर घास को देखता हूँ तो आपकी।

 

गाजर घास का रावण और होली मे गाजर घास

 

उडीसा मे एक व्याख्यान के बाद लोगो ने सलाह दी कि यदि इस सभा मे उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति यह ठान ले कि हर दिन वह दस लोगो को इस खरपतवार के विषय मे बतायेगा तो प्रचार का काम आसानी से और प्रभावी ढंग़ से बिना किसी व्यय के हो जायेगा। वहाँ उपस्थित लोगो ने हामी भारी और सही मायने मे बहुतो ने यह किया भी। बाद मे कई वर्षो तक उनसे सम्पर्क रहा। उन्होने मेरे सभी हिन्दी आलेखो को ले लिया और फिर उसे उडीया मे अनुवाद करके आम लोगो तक अपने खर्च पर पहुँचाया। बस्तर मे भी कई लोगो ने गोंडी भाषा मे इसे अनुवादित कर आम लोगो तक इसके विषय मे जानकारी पहुँचायी।

 

पिछले वर्ष मै उडीसा मे बस से यात्रा कर रहा था। पीछे की सीट पर बैठा हुआ एक स्कूली छात्र खिडकी से यात्रियो को गाजर घास दिखा रहा था और बता रहा था कि इससे कैसे नुकसान होता है। मेरी खुशी का ठिकाना नही रहा। मैने उसे अपना परिचय दिया और फिर अपने अभियान के बारे मे बताया। उसे अपने संगठन का सदस्य भी बनाया। उसने किसी व्याख्यान मे गाजर घास के बारे मे सुना था उसके बाद से वह इस छोटे पर महत्वपूर्ण कार्य मे जुट गया था। नयी पीढी के इस उत्साह से यह आस बन जाती है कि अब गाजर घास को नष्ट होने मे ज्यादा समय नही लगेगा।

 

जब मैने भिलाई मे औषधीय और सगन्ध फसलो की खेती के लिये सलाहकार का काम शुरु किया तो मुझे एक मारुति वैन मिली। मैने बिना देर किये इसके चारो ओर गाजर घास के विषय मे जानकारी लिखवा ली। लाल अक्षरो मे। गाडी प्रदेश भर मे घूमती थी इसलिये अपने आप लोगो के बीच इसका प्रचार हो जाता था। घर वालो के लिये यह अजींब सी बात थी। रिश्तेदारो ने भी कहा कि नयी गाडी पर ऐसा मत लिखो। बहुत बार बहुत से लोग इस तरह की प्रचार गाडी मे बैठने से मना कर देते थे। हद तो उस समय हो गयी जब मैने अपने घर के सामने घातक खरपतवार गाजर घास को नष्ट करे नारे को स्थायी तौर पर लिखवा लिया। इस पर काफी हो हल्ला हुआ। कहा गया कि इससे घर की सुन्दरता बिगडेगी और ऐसे नारे घरो के सामने नही लिखवाये जाते पर मैने हर उपलब्ध अवसर का लाभ उठाया। आज भी घर के सामने यह लिख हुआ है और सामने से गुजरने वालो का ध्यान यह आकर्षित करता है। बहुत से लोग अन्दर आ कर जानकारी भी माँगते है।

 

कृषि की शिक्षा के दौरान मैने अपने गाँव खुडमुडी मे एक नि:शुल्क परामर्श केन्द्र आरम्भ किया था। इस केन्द्र के माध्यम से वैज्ञानिको को किसानो से मिलने का सीधा अवसर प्राप्त होता था। उस समय स्थानीय गायन मंडली की सहायता से हम लोगो ने फसलो और कीटो से सम्बन्धित कई गीतो की रचना की थी। इनमे गाजर घास पर आधारित गीत भी थे। उस समय यह योजना थी कि कैसेट के रुप मे इसे प्रसारित किया जाये। पर खर्च अधिक होने के कारण यह योजना वही की वही धरी रह गयी।

 

गाजर घास पर देश भर मे बच्चो के बीच प्रतियोगिताओ का आयोजन भी किया गया। पेंटिग प्रतियोगिता मे बच्चो ने तूलिका के माध्यम से जबरदस्त प्रतिक्रिया दी। रायपुर मे गणेशोत्सव बडी धूमधाम से मनाया जाता है। हर बार अच्छी झाँकी बनाने वाली समिति को पुरुस्कृत किया जाता है। इस आशा मे कि लोग गाजर घास को विषय बनाकर झाँकी बनायेंगे एक विशेष पुरुस्कार भी मैने रखवाया। हर वर्ष इसकी घोषणा की जाती है पर अभी तक किसी ने भी इस विषय को नही चुना। हमे आशा है कि आगे समितियाँ इसमे रुचि लेंगी।

 

यहाँ मै सीहोर के एक आयोजन की बात सामने रखना चाहूंगा। यहाँ दशहरे मे हर बार रावण का पुतला गाजर घास से बनाया जाता है। ऐसे आयोजन सभी जगह होने लगे तो न केवल गाजर घास का फैलाव रुकेगा बल्कि आम लोगो मे जागरुकता भी आयेगी। मैने अपने स्तर पर होली पर गाजर घास को जलाने की पहल की है। हर बार हरे पेडो को जलाया जाता है इतना समझाने बुझाने के बाद भी। हम लोग आम लोगो को सुझाव देते है कि वे गाजर घास और ब्लूमिया नामक खरपतवारो को जलाये। गाजर घास इससे खत्म होगी और ब्लूमिया के जलने से मच्छरो से मुक्ति मिलेगी। दोनो ही खरपतवार आसानी से मिल जाते है और दोनो ही का नियंत्रण जरुरी है।

 

इतने सारे छोटे-छोटे प्रयासो से बढकर यदि एक बार लोकप्रिय लोग सार्वजनिक मंच से इसके लिये अपील कर दे तो पूरा देश इसे जान जायेगा। पता नही यह कब सम्भव होगा?

डाँ. महादेवप्पा : गाजर घास के लिये समर्पित एक जीवन

 

गाजर घास जागरुकता अभियान ने अभी जोर ही पकडा था कि धारवाड मे आयोजित इस पर प्रथम अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के विषय मे जानकारी मिली। एक शोध पत्र तैयार किया और भेज दिया। इस सम्मेलन की फीस बहुत अधिक थी। आयोजनकर्ताओ को लिखा तो उन्होने कुछ छूट देने की बात कही। अपने खर्च पर ट्रेन पर सवार होकर मै धारवाड पहुँच गया। दुनिया के कोने-कोने से विशेषज्ञ आये थे। मन मे बडा उत्साह था कि इनके साथ मै भी इस सम्मेलन मे शिरकत कर रहा था। वहाँ एक शख्स को देखा जिसके कारण यह विराट आयोजन सम्भव हो पाया था। वे थे डाँ एम.महादेवप्पा। पता चला कि उन्होने धान पर बहुत काम किया है पर गाजर घास के लिये तो जैसे उन्होने अपना जीवन ही समर्पित कर दिया है। मेरी उनसे मुलाकात एक प्रतिभागी जैसी ही रही। सम्मेलन के बाद वापस आकर मैने गाजर घास पर हिन्दी मे एक पुस्तक लिखी। इसे डाँ. महादेवप्पा और उनके कार्यो को समर्पित किया। मैने यह पुस्तक उन्हे भेजी पर भाषा की समस्या होने के कारण शायद उन्होने जवाब नही दिया। अगले ही वर्ष एक दूसरे सम्मेलन मे मेरा फिर से धारवाड जाना हुआ। इस समय वहाँ के परिचितो ने उनसे सीधी मुलाकात करवायी और मैने अपनी पुस्तक उन्हे दिखायी। वे प्रसन्न हुये और उसके बाद से तो वे मेरे मार्गदर्शक बन गये पूरे जीवन के लिये।

 

उन्होने देशी वनस्पतियो से गाजर घास नियंत्रण पर शोध किया और फिर अकादमिक दायरे से निकलकर जमीनी स्तर पर इस प्रयोग की सार्थकता दिखायी। आम लोगो विशेषकर किसानो ने इसे अपनाया और बहुत बडे क्षेत्र की गाजर घास को नियंत्रित किया। इससे प्रभावित होकर दूसरे प्रदेशो के वैज्ञानिको ने भी इस पर प्रयोग आरम्भ किये। आज इस अनूठे शोध के लिये वे दुनिया भर मे जाने जाते है।

 

आम तौर वैज्ञानिक अपने ही शोध को सही ठहराते है और दूसरे के कार्यो को बढावा नही देते है। पर डाँ. महादेवप्पा ने गाजर घास के सभी पहलुओ पर काम कर रहे वैज्ञानिको को प्रोत्साहित किया और एक दल बनाया। आज गाजर घास पर जितने शोध हो रहे है उसमे उनकी प्रेरणा का महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होने असंख्य व्याख्यान दिये है। सम्मेलन मे कृषि के अलावा दूसरे क्षेत्रो के विशेषज्ञ भी शामिल हुये। पहली बार चिकित्सा विशेषज्ञो और वैज्ञानिको ने मिलकर गाजर घास के विषय मे चर्चा की। बडी संख्या मे बच्चे भी आये। मुझे पता चला कि उनके प्रयास से बहुत से बच्चे गाजर घास पर अपना प्रोजेक्ट प्रस्तुत करने विदेशो मे भी गये। उनका यह प्रोत्साहन मुझे प्रेरित करता है कि मै भी ऐसे ही नयी पीढी की मदद करुँ।

 

सेवानिवृत होने के बाद भी उन्होने गाजर घास पर दूसरे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया। यह भी बहुत सफल रहा। अब वे अगले साल तीसरे सम्मेलन की तैयारी कर रहे है। सेवानिवृत होने के बाद कौन इस तरह की जिम्मेदारी लेने की हिम्मत कर पाता है? जब भी उनसे सम्पर्क होता है वे गाजर घास से सम्बन्धित कार्यो मे व्यस्त रहते है। उन्होने सरल अंग्रेजी मे वैज्ञानिक तथ्यो सहित गाजर घास पर एक पुस्तक लिखी है जो सस्ते मे अभी भी विश्वविद्यालय मे बिकती है। हम लोगो के लिये यह पवित्र ग्रंथ है।

 

समय-समय पर डाँ.महादेवप्पा को बडे सम्मानो से नवाजा गया पर फिर भी उनकी उपलब्धियो और सेवा के लिये उन्हे अंतरराष्ट्रीय सम्मान से नवाजे जाने की जरुरत है। इससे नयी पीढी को प्रेरणा मिलेगी और ज्यादा से ज्यादा लोग गाजर घास उन्मूलन अभियान से जुडेंगे।

 

आज ही उनका सन्देश आया कि इस हिन्दी लेखमाला को कन्नड मे अनुवादित कर वे लगातार पढ रहे है। इस सन्देश से मेरा उत्साह बढ गया है।

 

बिना आर्थिक मदद के दौडता गाजर घास पर एक संगठन

 

सारा देश जानता है कि गैर-सरकारी संगठन बनाकर काम करना घाटे का सौदा नही है। गाजर घास के लिये मैने वार एगेंस्ट पार्थेनियम (वाप) का गठन तो पहले ही कर लिया था। इसी के बैनर के तले गाजर घास के तमाम कार्यक्रम होते थे। कभी इसके पंजीयन की जरुरत नही पडी क्योकि जेब से ही इसे चलाते रहे। जब इस अभियान की प्रसिद्धि विदेशो तक पहुँची तो बहुत से संगठन सामने आ गये आर्थिक मदद के लिये। मुझे सलाह दी गयी कि मै एक सोसायटी बनाऊँ और उसका पंजीयन करवाऊँ। इसी के बाद पैसा मिल सकेगा। आनन-फानन मे पंजीयन की प्रक्रिया आरम्भ की। पता चला कि वार शब्द होने के कारण वार एगेंस्ट पार्थेनियम नाम से पंजीयन नही हो सकता। नया नाम सोचना होगा। नया नाम सोचा सोपाम (सोसायटी फार पार्थेनियम मैनेजमेंट)। यह नाम तो मंजूर हो गया पर उद्देश्यो मे आपत्ति लगती रही। इस बीच किसी ने सलाह दी कि जेब गर्म की जाये तो बिना आपत्ति के सब कुछ हो जायेगा। ऐसा ही हुआ।

 

कुछ समय बाद आर्थिक अनुदानो के लिये चक्कर लगने लगे। पता चला कि इसमे भी एक पूरा चैनल है। सीधा रास्ता नही है। आपको पैसा मिलेगा इसलिये जो इस चैनल मे है उन्हे भी पैसा देना होगा। और भी कई मजबूरियो का पता चला। जैसे आला अफसरो को खुश रखना होगा वगैरह-वगैरह।  जल्दी ही मन कहने लगा कि यह ठीक रास्ता नही है। जब तक जीवन-मरण का प्रश्न न हो क्यो भ्रष्ट बना जाये। इस सोच ने बचा लिया इस दलदल मे फँसने से। मैने निश्चय किया कि जितना बन पडेग़ा अपने दम पर इसे चलाऊँगा। ऊपर वाले की दया है जो आज भी यह संगठन मेरे अपने पैसे से चल रहा है। मैने ऊपर लिखा है कि माननीय मेनका गाँधी ने एक बार मेरे कार्यो पर इंडिया टीवी पर एक कार्यक्रम पेश किया था। उन्होने पूछा था कि नमक का पैसा कहाँ से आता है? और इसमे अब तक कितने खर्च हो गये है? मैने उन्हे बताया अभी तक दो लाख खर्च हुये है और मै इस कार्य के लिये किसी से पैसे नही लेता तो उन्हे एक बारगी विस्वास नही हुआ। आज गाजर घास पर वेबसाइट और सोपाम के कार्यो को देखकर सब यही मानते है कि जरुर विदेश से तगडा पैसा आ रहा होगा। लाख समझाने पर भी लोगो को यकीन नही आता। आज का हमारा समाज ऐसा हो गया है। बिना लाभ के कम ही लोग काम करते है और उन्हे आम बोलचाल की भाषा मे सिरफिरा कहा जाता है।  

 

कुछ वर्षो पहले मै भारत सरकार के बायोटेक्नोलाजी विभाग के आमंत्रण पर गाजर घास के उपयोगो पर शोध-पत्र पढने दिल्ली गया। वहाँ इसे सराहा गया और मुझसे कहा गया कि मै सोपाम के माध्यम से प्रस्ताव भेजूँ ताकि इस पर आर्थिक मदद की मंजूरी हो सके। इसी तरह दुनिया भर के खरपतवार विशेषज्ञो के संगठन ग्लोबल इंवेसिव स्पीसीज इनफारमेशन नेटवर्क़ (जी.आई.एस.आई.एन) ने भी कई बार प्रस्ताव भेजने के लिये अनुरोध किया। मै इसका एकमात्र ऐसा सदस्य हूँ जो बिना आर्थिक सहायता से गाजर घास पर काम कर रहा है। इस संगठन के पास अपार धन है। मुझे गाजर घास के अध्ययन के दौरे के लिये बहुतो ने छोटे हेलीकाप्टर खरीदने मे सहायता का प्रस्ताव भी दिया।

 

 मुझे लगता है कि पैसा ही जीवन मे सब कुछ नही है। फिर नि:स्वार्थ रुप से काम करना कठिन है पर इससे जो खुशी मिलती है उसकी अनुभूति ही अलग है।

 

आज दुनिया भर से हर माह सैकडो पत्र और ई-मेल आते है कि हम गाजर घास से कैसे बचे? यदि कोई चाहे तो इससे बहुत अधिक धानार्जन किया जा सकता है। प्रभावित लोग फीस देने की बात तो करते ही है। पर मैने गाजर घास से आय न प्राप्त करने का मन बनाया है। आज तक तो इस पर कायम हूँ।  

 

आज सोपाम के सैकडो सदस्य है और अपने-अपने स्तर पर जागरुकता फैला रहे है। उनसे कोई फीस नही ली जाती। सब अपनी क्षमता के अनुसार समय-समय पर अभियानो मे भाग लेते रहते है। बहुत से ऐसे सदस्य है जो अपने बायोडेटा मे इसका नाम लिखने तक ही सहयोग करते है। सोपाम मे सबका स्वागत है। 

 

गाजर घास पर दुनिया की पहली वेबसाइट

 

गाजर घास पर आयोजित प्रथम अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान दुनिया भर के वैज्ञानिको ने यह तय किया कि एक संगठन बनाया जाये ताकि समान विचार वाले इतने सारे विशेषज्ञ मिलकर इस खरपतवार से निपट सके। इस संगठन का नाम रखा गया आईपान (इंटरनेशनल पार्थेनियम नेटवर्क)। पर जैसा कि अक्सर होता है सम्मेलन के बाद सारा काम ठंडा पड गया। इन सब के लिये किसी एक को नेतृत्व सम्भालना पडता है और अक्सर लोग एक दूसरे से यह अपेक्षा करते रहते है। सम्मेलन से वापस लौटने के बाद मैने पत्र के माध्यम से सभी वैज्ञानिको को जोडे रखा और एक पत्रिका निकालने का निश्चय किया। इसका नाम रखा गया इंटरनेशनल पार्थेनियम न्यूज। बमुश्किल से एक अंक निकल पाया कि फिर आर्थिक समस्या उठ खडी हुयी। सभी सदस्यो ने पैसे नही दिये और मुझे समझाया गया कि कम से कम एक साल तो इसे आप अपने खर्च पर चलाये। यह सम्भव नही था फिर सस्ते विकल्प की तलाश शुरु हुयी। अंत मे एक वेबपेज बनाकर यह काम शुरु करने का निर्णय हुआ। यह वेबपेज बन गया और मुम्बई से संचालित होने लगा। यह सभी के लिये मुफ्त था। इसमे गाजर घास पर नवीनतम शोध की जानकारी शामिल की जाने लगी। वैज्ञानिको के पत्र शामिल होने लगे। गाजर घास के दसो चित्र आने लगे दुनिया भर से। कुछ समय मे ही इंटरनेशनल पार्थेनियम रिसर्च न्यूज ग्रुप के नाम से दुनिया की पहली वेबसाइट गाजर घास पर बन गयी। आज भी यह दुनिया की एकमात्र साइट है जो एक खरपतवार के बारे मे इतने विस्तार से जानकारी प्रदान करती है। दुनिया भर मे असंख्य लोग अब तक इस वेबसाइट का उपयोग कर चुके है। हजारो शोध पत्रो मे इसका उल्लेख मिलता है। आज भी पार्थेनियम खोजने पर गूगल मे सबसे ऊपर यही दिखती है। मैने इस वेबसाइट से वैज्ञानिको के अलावा उन सभी को जोडने का प्रयास किया जो प्रत्य़क्ष और अप्रत्यक्ष रुप से गाजर घास से जुडे है।

 

पहले इंटरनेट पर हिन्दी मे लिखना कठिन था। मेरी हमेशा से यह इच्छा रही कि गाजर घास पर इस वेबसाइट मे हिन्दी मे भी जानकारियाँ हो। अब यह स्वप्न साकार होता दिखता है। कुछ ही दिनो मे हिन्दी आलेख भी आपको इसमे पढने मिलेंगे। आपने डाँ. महादेवप्पा की जिस पुस्तक के विषय मे ऊपर पढा उसे भी मैने इस साइट पर डाल दिया है। इसकी कीमत बहुत कम है पर साइट पर तो यह बिल्कुल ही मुफ्त है।

 

आपको रोज नयी जानकारी मिले और आप मुम्बई मे बैठे संचालक से कहे कि इसे साइट मे शामिल करो तो निश्चित ही पैसे की बात होगी। उस समय मेरे पास कम्प्यूटर नही था। मै साइबर कैफे से यह काम करता था। संचालक ने पैसो की माँग शुरु कर दी। रोज नयी जानकारी डालने के बदले यह तय किया गया कि साल मे दो बार ही यह कार्य होगा। यह कठिन निर्णय ले लिया गया। धीरे-धीरे साल मे एक बार ऐसा होने लगा। यह तो अच्छा था कि शुरु मे ही मेहनत करके बहुत सारी जानकारियाँ डाल दी गयी थी। संचालक से विवाद के चलते दो सालो तक सब कुछ रुका रहा। अब हिम्मत करके अपने ही शहर के संचालक के हाथो मे इसे पहुँचाया है। अब उम्मीद है कि रोज नयी जानकारी शामिल करने का स्वप्न साकार हो पायेगा।

 

इस वेबसाइट मे एक तरफा संवाद होता देख मैने याहू मे एक ग्रुप बनाया और इसमे चर्चा आरम्भ की। एक ही विषय मे लगातार चर्चा मुश्किल है। फिर भी यह याहू ग्रुप सक्रिय है और नये लोगो के लिये वरिष्ठो से जुडने का मंच बना हुआ है। समस्या के हल होते तक अलख जगाये रखना जरुरी है। इसी का प्रयास मै कर रहा हूँ।   

 

गाजर घास से बेहाल वन्य प्राणी

 

गाजर घास से नाना प्रकार के रोग होते है। इससे मनुष्यो और फसलो को बडा नुकसान होता है। यह सब तो आप सुनते-पढते रहते है। पर यह विदेशी खरपतवार किस तरह से वन्य जीवो के लिये अभिशाप बना हुआ है इस बारे बहुत कम ही सुनने-पढने मे आता है। देश का शायद ही ऐसा कोई वनीय क्षेत्र होगा जहाँ इसका प्रकोप नही है। चूँकि गाजर घास पर शोध मनुष्यो और फसलो को केन्द्रित कर हो रहे है इसलिये वन्य जीवो पर इसके असर के आँकडे नही मिलते है। आप जानते ही है कि जब गाय गल्ती से गाजर घास खा जाती है तो उसका जहर दूध मे भी आ जाता है। विदेशो विशेषकर आस्ट्रेलिया  जहाँ पशु माँस खाया जाता है, मे यह पाया गया है कि चारागाहो मे गाजर घास का प्रकोप पशु माँस उद्योग को बुरी तरह नुकसान पहुँचा रहा है। मध्य भारत के वनीय़ क्षेत्रो के निवासी बताते है कि गाजर घास का प्रकोप बरसात मे इस कदर बढ जाता है कि हिरणो को हरी घास के लिये गाजर घास की घनी आबादी से होकर गुजरना पडता है। कितना भी बचे पर गाजर घास हिरन के आहार तंत्र मे प्रवेश कर ही जाती है। हिरण के शरीर मे विष का प्रवेश मतलब इससे पूरे जंगल यहाँ तक कि इन पर आश्रित रहने वाले माँसाहारियो विशेषकर शेरो का प्रभावित होना है। हिरण के मल पर आश्रित रहने वाले डंग बीटल भी इससे प्रभावित होते है।

 

हिरण और बाकी सभी जानवरो को मजबूरी मे ही सही पर गाजर घास के पौधो के बीच से गुजरना पडता है। इससे उन्हे नाना प्रकार के त्वचा रोग हो जाते है। ठीक उसी तरह जिस तरह हमारे पालतू पशुओ को ये रोग हो जाते है।  मैने अपने सर्वेक्षणो के दौरान जंगलो मे पानी के पास इसे उगते पाया है। पानी के पोखरो पर ही सभी वन्य जीव आश्रित रहते है। गाजर घास पानी की सहायता से एक स्थान से दूसरे स्थान तक फैलती है। इसके बीज जल धारा के साथ बहते रहते है। इस तरह एक बार जंगल मे प्रवेश के साथ ही हर साल यह फैलती जाती है। पशुओ के साथ भी इसका फैलाव होता है। अब जब मनुष्य अपने आस-पास उग रही गाजर घास से निपट नही पा रहा है तो भला जंगल मे इसके निर्बाध फैलाव पर कौन अंकुश लगायेगा?

 

जैसे मैने पहले लिखा है कि वाहनो से इसका फैलाव बहुत तेजी से होता है। जिन जंगलो मे सैलानियो की आवाजाही बढ रही है वहाँ गाजर घास भी बढ रही है। किसी का ध्यान इसपर नही है। पिछले दिनो मै कवर्धा के मैकल पर्वत श्रेणियो मे गाजर घास के फैलाव को देख कर चकित रह गया। मुझे पहाडो मे काफी ऊपर तक इसका प्रकोप मिला। साथ चल रहे स्थानीय निवासी ने बताया कि घाटी का मनोरम दृश्य देखने के लिये विदेशी सैलानियो का काफिला इन चोटियो पर आता है। उनके साजो-समान और जूतो के साथ इसके बीज भी पहुँच जाते है बिना रोक-टोक। यदि उनके आने-जाने का एक ही रास्ता कर दिया जाये और रास्ते से गाजर घास को हटा दिया जाये तो इसके प्रसार को रोका जा सकता है। आवश्यकत्ता है जागरुकता लाने की।

 

सबसे दुखद दृश्य कुछ वर्षो पहले मध्यप्रदेश के पेंच वन अभ्यारण्य मे देखने को मिला। जंगल का राजा गाजर घास के पास बैठा हुआ था। उसकी गुफा से लेकर पेंच नदी के तट तक गाजर घास का फैलाव था। जंगल के इस राजा के पास मनुष्यो के किये की सजा भुगतने के अलावा कोई चारा नही था। जंगल का पारिस्थितिकी तंत्र बडा ही नाजुक होता है। गाजर घास के नियंत्रण के लिये अब तक उपलब्ध विधियो के प्रयोग की संभावना जंगलो मे नही दिखती। रसायन जंगल के लिये अभिशाप है, विदेशी कीट किस देशी वनस्पति को खाना शुरु कर दे यह पता नही, नयी वनस्पतियो को जंगल मे फैलाकर स्थानीय वनस्पतियो के अस्तित्व पर खतरा खडा करना भी समझदारी नही है तो फिर कैसे जंगलो से गाजर घास को नष्ट क़िया जाये?

 

ज्यादातर विशेषज्ञो का ध्यान इस ओर नही है। यदि उनसे पूछा जाये तो वे विस्तृत शोध की बात करेंगे। इसमे करोडो लगेंगे और पता नही कब शोध परिणाम सामने आयें। जमीन से जुडे वनवासियो जिन्हे मै असली वैज्ञानिक मानता हूँ, से मैने समाधान माँगा तो उन्होने कहा कि गाजर घास से निपटने प्रकृति माँ कोई प्राकृतिक तरीका ढूँढ निकालेगी पर तब तक आधुनिक मनुष्य को उन उपायो को अपनाना होगा जिससे कि नये बीज जंगल के अन्दर नही आये।

 

जंगल मे वनस्पतियो के औषधीय उपयोगो मे बन्दरो की कोई सानी नही है। जंगल मे भ्रमण करने वालो और पशु व्यवहार पर सतत निगरानी रखने वालो ने बहुत बार बन्दरो को गाजर घास की जड उखाडकर ले जाते देखा है। यह सम्भव है कि वे इसका कुछ उपयोग कर रहे हो। मनुष्य सदा से जानवरो द्वारा वनस्पतियो के प्रयोग से सीखता रहा है। उम्मीद की जानी चाहिये कि इस बार भी उसके पूर्वज यानि बन्दर उसे नयी राह दिखायेंगे इस विदेशी खरपतवार के उपयोग की।     

 

आखिर कीमत चुकानी ही पडी गाजर घास पर काम करने की 

 

शुरु के कुछ वर्षो तक गाजर घास के साथ काम करने पर मुझे तकलीफ नही हुयी पर धीरे-धीरे दमा (अस्थमा) जैसे लक्षण आने लगे। पहले लगा कि आम सर्दी-खाँसी है। इसकी दवा चलती रही पर जब साधारण दवाओ ने असर दिखाना बन्द कर दिया और मर्ज बढता ही गया तो आधुनिक चिकित्सको को परागकणो से होने वाले एलर्जी का शक हुआ। उन्होने दिनचर्या का ब्यौरा माँगा तो उन्हे दिन मे कई बार गाजर घास शब्द सुनायी दिया। उनके कान खडे हो गये। जल्दी ही यह स्पष्ट हो गया कि रोग की जड गाजर घास है। उन्होने कठोर शब्दो मे कहा कि गाजर घास से दूर रहे। आप ही बताइये क्या यह सम्भव है? ऐसा कैसे हो सकता था कि मै अभियान से दूर रहूँ और आम लोगो को गाजर घास नष्ट करने के लिये प्रेरित करुँ? चिकित्सको की बात अनसुनी कर दी। जब भी साँस लेने मे तकलीफ होती तो दमा का औषधियाँ ले लेता था। एक रात पानी सिर से ऊपर पहुँच गया। साँस की तकलीफ के कारण अस्पताल की शरण लेनी पडी। चिकित्सको ने कहा कि एक इंजैक्शन लगवा लीजिये तो तीन माह तक आप गाजर घास के पास जाकर भी नुकसान से बचे रहेंगे। इस बारे मे छानबीन की तो पता चला कि अभी तो ठीक है पर बाद मे कम समय अंतराल मे इसे लगवाना होगा और फिर इसके बिना जीवन मुश्किल हो जायेगा।

 

इसी बीच पारम्परिक चिकित्सको से मैने सलाह ली। उन्होने कहा कि गाजर घास के पास भी रहना है और आधुनिक दवा भी नही लेनी है तो फिर एक ही उपाय है और वह है शरीर को मजबूत बनाना। जीवन को नियमित करो और शरीर को रोगो से लडने मे सक्षम बनाओ। मैने इसे अपनाया। समय पर खाना और अच्छा खाना आरम्भ किया। कुछ ही दिनो मे आधुनिक दवाओ पर निर्भरता कम हो गयी फिर तो दवा लिये बहुत से वर्ष बीतते गये। पारम्परिक चिकित्सको ने सलाह दी कि यह साधना आजीवन करनी होगी। जरा सी भी चूक फिर से उसी समस्या को जगा देगी।

 

मैने गाजर घास से प्रभावित बहुत से लोगो से मुलाकात की है। उन्हे पता है कि एलर्जी किससे है। वे उस स्थान को छोडकर जा नही सकते। गाजर घास के साथ रहने के लिये उन्होने बहुत से उपाय अपने अनुभव से सीखे। आप जानते ही होंगे कि प्रदूषण वाले इलाको मे लोगो को गुड खाने की सलाह दी जाती है। इससे रक्त से प्रदूषक निकल जाते है और उनका बुरा प्रभाव नही पडता है। गाजर घास की एलर्जी से बचाव के लिये भी प्रभावित लोग गुड का सहारा लेते है। पारम्परिक चिकित्सक इस सरल प्रयोग पर अपनी सहमति देते है। वे कहते है कि गुड के प्रभाव को स्थायी बनाने के लिये इसे हल्दी के साथ लेना जरुरी है। जब गाजर घास के कारण साँस की तकलीफ बढती है तो लोग गरम पानी पीना आरम्भ कर देते है। पानी घूँट-घूंट करके पीया जाता है। इससे उन्हे राहत महसूस होती है। ऐसा क्यो होता है-यह स्वास्थ्य विशेषज्ञ ही भली-भाँति बता सकते है।

 

कुछ वर्षो पहले मै जबलपुर-नागपुर रोड मे जबलपुर के पास गाजर घास के प्रकोप की तस्वीरे ले रहा था। मुझे सरकारी विभाग द्वारा नियुक्त कुछ कर्मचारी मिले जो कि गाजर घास को हाथो से उखाड रहे थे। उन्होने कोई भी सुरक्षा उपाय नही अपनाये थे। विभाग की तरफ से उन्हे इसके विषय मे जानकारी नही दी गयी थी। मैने उनसे पूछा कि क्या यह घास कोई नुकसान नही पहुँचाती? लगा जैसे मैने उनकी दुखती रग को छेड दिया। उन्होने अपने हाथ मे गाजर घास के कारण हुये त्वचा रोग को दिखाया। यह भी बताया कि उनमे से कई को साँस की बीमारी भी हो गयी है। पर फिर भी काम तो काम है। फायदा हो या नुकसान काम तो करना ही है। उन्होने बताया कि सरसो के तेल को पूरे शरीर मे लगा कर गाजर घास उखाडने से कम असर होता है। यह उनकी मजबूरी थी कि वे रोज-रोज तेल का खर्च नही उठा सकते थे। ऐसे न जाने कितने सारे लोग गाजर घास के अभिशाप को झेल रहे है।

 

अभी हाल ही मे बहुत से ऐसे चिकित्सक जो गाजर घास जनित रोगो की चिकित्सा मे दक्ष है, हमारे संगठन से जुड गये है। इससे उन सैकडो मरीजो को आसानी हो जाती है जो सही परामर्श के अभाव मे भटकते रहते है। वे मुझसे सम्पर्क करते है तो मै इन चिकित्सको के पास उन्हे भेज देता हूँ। संगठन से आया जानकर ज्यादातर मामलो मे चिकित्सक उनसे फीस नही लेते है। यह भी एक बहुत बडा योगदान है इस अभियान मे।                   

 

गाजर घास और किसानो की आत्महत्या

 

दुनिया भर के शोध परिणाम यह बताते है कि गाजर घास यदि खेतो मे फसलो के साथ प्रतियोगिता करे तो पूरी फसल भी चौपट हो सकती है। पहले यह बेकार जमीन और मेडो तक सीमित थी पर अब खेतो मे इसके प्रवेश कर जाने से भारतीय कृषि को बहुत नुकसान हो रहा है। ये नुकसान प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनो है। नमी, प्रकाश और भोजन के लिये गाजर घास फसल से प्रतियोगिता करती है। इसके परागकण पर-परागण करने वाली फसलो के संवेदी अंगो मे एकत्र हो जाते है जिससे उनमे परागण नही हो पाता है। खेतो मे गाजर घास किसानो को सीधे प्रभावित करती है। उसके पशु भी प्रभावित होते है। गाजर घास के जहरीले रसायन मिट्टी की उर्वर क्षमता को प्रभावित करते है। किसान के पास रसायनो के प्रयोग के अलावा कोई सशक्त विकल्प नही होता। जैविक खेती कर रहे किसान बडी दुविधा मे पड जाते है।

 

गाजर घास का किसानो, फसलो और पशुओ पर यह दुष्प्रभाव दशको से निरंतर हो रहा है। आज हम विदर्भ के किसानो की आत्महत्या के विषय मे जानते है पर गाजर घास पर आयोजित प्रथम अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन मे बताया गया कि गाजर घास जनित रोगो से अब कर्नाटक मे सात किसान आत्महत्या कर चुके है। उसके बाद तो गाजर घास और फैली पर नये आँकडे उपलब्ध नही हो पाये। पुलिस आत्महत्या का कारण गाजर घास नही लिखती है। उसे मालूम भी नही कि यह गाजर घास है क्या? पर विशेषज्ञ यह जानते है कि देश भर मे इस विदेशी खरपतवार ने सैकडो जाने ली है और असंख्य लोगो को रोगी बनाया है। जब से इसका प्रवेश हुआ है तब से इसने दीमक की तरह हमारी कृषि व्यवस्था को खोखला कर दिया है। और यह सब अभी भी जारी है निरंतर।

 

विशेषज्ञो ने बहुत बार यह प्रयास किया कि गाजर घास से अभी तक देश को कितना नुकसान पहुँचा है- यह आँका जाये पर यह आँकलन पूरा नही हो पाया। आँकडे करोडो मे नही अरबो मे जा रहे है। यह विडम्बना ही है कि जिस विदेशी खरपतवार से देश को इतना नुकसान पहुँच रहा है उसे लाने वालो पर कभी किसी ने अंगुली नही उठायी। यह सभी जानते है कि यह आयातित गेहूँ के साथ पीएल-480 योजना के तहत भारत आयी और देखते ही देखते पूरे देश मे फैल गयी। कौन है वे लोग जिन्होने यह लापरवाही बरती और खरपतवारयुक्त गेहूँ के आयात की अनुमति दे दी? क्या कभी किसी ने यह पता लगाने की कोशिश की। जिस देश से यह खरपतवार आया आज वही से इसे मारने के लिये रसायन आ रहे है। यह तो वही बात हुयी कि पहले दर्द दिया, फिर दवा की।

 

अलग-अलग मंचो से मैने यह बात उठायी है कि दोषियो की खोज की जाये और इस गल्ती से सबक लेते हुये कठोर कानून बनाये जाये। इसमे ऐसी गल्ती जानबूझकर करने वालो को देशद्रोही माना जाये और कडी सजा का प्रावधान हो। आप ही बताइये कि गाजर घास लाने वालो को यदि अभी तक सजा मिल गयी होती तो आज कोई राजनेता भारत मे ऐसे घटिया गेहूँ को एक बार फिर से विदेशो से आयात करने का दुस्साहस करता जिसमे घोषित रुप से गाजर घास सहित 32 विदेशी खरपतवारो के